श्री शिव पंचाक्षर स्तोत्र - भगवान शिव के दिव्य अक्षरों का आह्वान

श्री शिव पंचाक्षर स्तोत्र, जिसे पंचाक्षर मंत्र के रूप में भी जाना जाता है, भगवान शिव को समर्पित एक श्रद्धेय भजन है, जो हिंदू धर्म के प्रमुख देवताओं में से एक है। संस्कृत में रचित यह मंत्र भगवान शिव के दिव्य गुणों और प्रतीकवाद के सार को समाहित करता है। इस मंत्र का प्रत्येक अक्षर गहरा महत्व रखता है और दुनिया भर में लाखों भक्तों द्वारा गहरी भक्ति के साथ इसका जाप किया जाता है।

मंत्र:
ॐ नमः शिवाय।

अर्थ:
मंत्र पाँच अक्षरों से बना है:

ॐ: सार्वभौमिक ध्वनि और अनंत ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है।
नमः: नमस्कार, समर्पण और समर्पण को दर्शाता है।
शिवाय: शुभ और परोपकारी भगवान शिव को संदर्भित करता है।

स्तोत्र एवं भाषांतर

इस स्तोत्र के पाँचों श्लोकों में क्रमशः न, म, शि, वा और य है अर्थात् नम: शिवाय। यह पूरा स्तोत्र शिवस्वरूप है।

नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय भस्मांगरागाय महेश्वराय।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै "न" काराय नमः शिवाय॥

हे महेश्वर! आप नागराज को हार स्वरूप धारण करने वाले हैं। हे (तीन नेत्रों वाले) त्रिलोचन, आप भस्म से अलंकृत, नित्य (अनादि एवं अनंत) एवं शुद्ध हैं। अम्बर को वस्त्र समान धारण करने वाले दिगम्बर शिव, आपके 'न' अक्षर द्वारा जाने वाले स्वरूप को नमस्कार है।

मंदाकिनी सलिल चंदन चर्चिताय नंदीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय।
मंदारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय तस्मै "म" काराय नमः शिवाय॥

चन्दन से अलंकृत, एवं गंगा की धारा द्वारा शोभायमान, नन्दीश्वर एवं प्रमथनाथ के स्वामी महेश्वर आप सदा मन्दार एवं बहुदा अन्य स्रोतों से प्राप्त पुष्पों द्वारा पूजित हैं। हे शिव, आपके 'म' अक्षर द्वारा जाने वाले रूप को नमन है।

शिवाय गौरी वदनाब्जवृंद सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय।
श्री नीलकण्ठाय वृषध्वजाय तस्मै "शि" काराय नमः शिवाय॥

हे धर्मध्वजधारी, नीलकण्ठ, शि अक्षर द्वारा जाने जाने वाले महाप्रभु, आपने ही दक्ष के दम्भ यज्ञ का विनाश किया था। माँ गौरी के मुखकमल को सूर्य समान तेज प्रदान करने वाले शिव, आपके 'शि' अक्षर से ज्ञात रूप को नमस्कार है।

वसिष्ठ कुम्भोद्भव गौतमार्य मुनींद्र देवार्चित शेखराय।
चंद्रार्क वैश्वानर लोचनाय तस्मै "व" काराय नमः शिवाय॥

देवगण एवं वसिष्ठ , अगस्त्य, गौतम आदि मुनियों द्वारा पूजित देवाधिदेव! सूर्य, चन्द्रमा एवं अग्नि आपके तीन नेत्र समान हैं। हे शिव !! आपके 'व' अक्षर द्वारा विदित स्वरूप को नमस्कार है।

यक्षस्वरूपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय तस्मै "य" काराय नमः शिवाय॥

हे यक्ष स्वरूप, जटाधारी शिव आप आदि, मध्य एवं अंत रहित सनातन हैं। हे दिव्य चिदाकाश रूपी अम्बर धारी शिव !! आपके 'य' अक्षर द्वारा जाने जाने वाले स्वरूप को नमस्कार है।

पंचाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेत् शिव सन्निधौ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते॥

जो कोई भगवान शिव के इस पंचाक्षर मंत्र का नित्य उनके समक्ष पाठ करता है वह शिव के पुण्य लोक को प्राप्त करता है तथा शिव के साथ सुखपूर्वक निवास करता है।

॥ इति श्रीमच्छंकराचार्यविरचितं श्रीशिवपंचाक्षरस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥[1]

महत्व

पंचाक्षर मंत्र हिंदू धर्म में अत्यधिक आध्यात्मिक महत्व रखता है। इसमें भगवान शिव के प्रति एक भक्त की भक्ति, श्रद्धा और आकांक्षा समाहित है। प्रत्येक अक्षर भगवान शिव के व्यक्तित्व के एक दिव्य पहलू से मेल खाता है, जिसका उच्चारण करने पर एक शक्तिशाली कंपन पैदा होता है।

ॐ: मौलिक ध्वनि, परम वास्तविकता और सभी अस्तित्व के स्रोत का प्रतिनिधित्व करती है।
नमः : सर्वोच्च दैवीय सत्ता को स्वीकार करते हुए विनम्रता और समर्पण व्यक्त करता है।
शिवाय : भगवान शिव के दिव्य गुणों पर प्रकाश डालता है, जिसमें शुभता, पवित्रता और अनंत करुणा शामिल हैं।

जप के लाभ

माना जाता है कि श्री शिव पंचाक्षर स्तोत्र का भक्तिपूर्वक जाप करने से विभिन्न आध्यात्मिक और भौतिक लाभ मिलते हैं:

शुद्धिकरण: मंत्र मन, शरीर और आत्मा को शुद्ध करता है, नकारात्मक ऊर्जाओं और विचारों को समाप्त करता है।
आंतरिक शांति: नियमित जप से आंतरिक शांति मिलती है, तनाव कम होता है और मानसिक शांति को बढ़ावा मिलता है।
आध्यात्मिक जागृति: मंत्र आध्यात्मिक चेतना जागृत करने और परमात्मा के साथ व्यक्ति के संबंध को गहरा करने में सहायता करता है।
सुरक्षा: इस मंत्र के माध्यम से भगवान शिव का आशीर्वाद प्रतिकूलताओं और चुनौतियों से सुरक्षा प्रदान करता है।
बाधाओं को दूर करना: जप आध्यात्मिक और भौतिक मार्ग पर आने वाली बाधाओं को दूर करने में मदद करता है।

जप अनुष्ठान

भक्त अक्सर पंचाक्षर मंत्र को अपनी दैनिक आध्यात्मिक प्रथाओं में शामिल करते हैं। जप करने का आदर्श तरीका एक शांत स्थान ढूंढना, आरामदायक मुद्रा में बैठना और जप करते समय प्रत्येक अक्षर के अर्थ पर ध्यान केंद्रित करना है। भक्ति के साथ नियमित जप मंत्र के सकारात्मक प्रभावों को बढ़ाता है।

शिव पंचाक्षर स्तोत्र का पाठ कब करें?

शिव पंचाक्षर स्तोत्र का पाठ आप किसी भी समय और किसी भी दिन कर सकते हैं। क्योकि यह स्त्रोत का प्रतिदिन पाठ करने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता हे

महाशिवरात्रि: महाशिवरात्रि पर्व पर शिव पंचाक्षर स्तोत्र का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
सोमवार: सोमवार भगवान शिव को समर्पित होता है और इसे महादेव का दिन माना जाता है।
श्रावण मास: हिन्दू कैलेंडर के श्रावण मास को शिव मास के रूप में जाना जाता है।
ब्रह्म मुहूर्त: सुबह के ब्रह्म मुहूर्त में शिव पंचाक्षर स्तोत्र का पाठ करने का विशेष महत्व होता है। इस समय आत्मीयता, शांति और स्थिरता का माहौल बनता है।

निष्कर्ष

श्री शिव पंचाक्षर स्तोत्र भगवान शिव के दिव्य गुणों का सार समाहित करता है और भक्ति, समर्पण और परमात्मा के साथ संबंध का प्रतीक है। इस मंत्र का ईमानदारी और श्रद्धा के साथ जाप करने से न केवल भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त होता है, बल्कि आध्यात्मिक विकास, आंतरिक शांति और समग्र कल्याण भी होता है।










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