इतिहास की मूक नायिका: त्याग की वो देवी, जिसे महाभारत भूल गया!

नई दिल्ली: जब भी महाभारत का ज़िक्र होता है, हमारे मन में कुंती का संघर्ष, गांधारी की पीड़ा या द्रौपदी का अपमान उभरता है। लेकिन पांडव कुल की एक ऐसी भी वधू थी, जिसने इन रानियों से भी अधिक कष्ट सहा, पर इतिहास ने उसके त्याग को हाशिये पर रख दिया। यह कहानी है पांडव कुल की पहली कुलवधू—माता हिडिम्बी की।

1. कठिन प्रेम और भाई का वध

हिडिम्बी का जीवन एक गहरे विरोधाभास से शुरू हुआ। जिस भीम ने उसके भाई हिडिम्ब का वध किया, हिडिम्बी ने अपना हृदय उन्हीं को दे दिया। अपने प्रेम के लिए अपने सगे भाई की मृत्यु को स्वीकार करना—एक स्त्री के हृदय के लिए इससे बड़ा बोझ क्या हो सकता है?

2. बिना महल की 'प्रथम महारानी'

तकनीकी रूप से वह पांडवों की पहली बहू थीं, लेकिन राजसी सुख उनके भाग्य में नहीं था। उनका विवाह एक निष्ठुर शर्त पर हुआ था: “जैसे ही संतान का जन्म होगा, पति उन्हें छोड़कर चला जाएगा।” एक नवविवाहिता के लिए इससे अधिक क्रूर और क्या हो सकता है कि उसे अपने सुहाग के जाने की तारीख पहले से पता हो?

3. एकाकी जीवन और एकल परवरिश

पुत्र घटोत्कच के जन्म लेते ही भीम ने वचन के अनुसार उन्हें त्याग दिया। कुंती और अन्य पांडव भी अपनी यात्रा पर आगे बढ़ गए। हिडिम्बी ने घने जंगलों में बिना किसी राजमहल या सेवक के अकेले ही अपने पुत्र को एक महान और आज्ञाकारी योद्धा बनाया।

4. महाभारत का निर्णायक बलिदान

सालों की उपेक्षा के बाद भी, जब महाभारत युद्ध की विपत्ति आई, तो हिडिम्बी प्रतिशोध के साथ नहीं बल्कि सहायता के लिए खड़ी हुईं। उन्होंने अपने इकलौते बेटे घटोत्कच को रणभूमि में झोंक दिया। वह जानती थीं कि घटोत्कच की मृत्यु ही अर्जुन के प्राण बचा पाएगी।

5. सिर्फ बेटा ही नहीं, पोते भी...

बलिदान की यह गाथा यहीं नहीं रुकी। घटोत्कच के पुत्र और हिडिम्बी के पोते—बर्बरीक (जिन्हें आज हम खाटू श्याम जी के रूप में पूजते हैं), अंजनपर्वण और मेघवर्ण भी अजेय योद्धा थे। एक ही युद्ध में अपना बेटा और पोते खोने वाली वह माँ नितांत अकेली रह गई, लेकिन धर्म की विजय के लिए उन्होंने अपना सर्वस्व वार दिया।

निष्कर्ष

हिडिम्बी भले ही 'राक्षसी' कुल की थीं, लेकिन उनकी मानवीयता और त्याग किसी भी देवी से बढ़कर था। आज भी पांडवों की जीत की नींव में उस वनवासिनी माँ के आंसुओं की नमी छिपी है। त्याग की प्रतिमूर्ति माता हिडिम्बी को शत-शत नमन।


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