लक्ष्मी-नारायण और राजा बलि की कथा: जब भगवान को बनना पड़ा द्वारपाल

लक्ष्मी-नारायण और राजा बलि की कथा: जब भगवान को बनना पड़ा द्वारपाल

नई दिल्ली: भारतीय पुराणों में भक्ति और दान की महिमा को सर्वोपरि माना गया है। राजा बलि की दानवीरता और नारायण की अपने भक्त के प्रति निष्ठा की यह कथा हमें सिखाती है कि जहाँ ईश्वर का वास होता है, वहाँ सुख-समृद्धि और लक्ष्मी स्वयं खिंची चली आती हैं।

1. जब रावण पहुँचा पाताल लोक

कथा के अनुसार, एक बार अहंकारी रावण घूमते हुए पाताल लोक में राजा बलि के पास पहुँचा और उन्हें युद्ध के लिए ललकारने लगा। बलि के द्वार पर स्वयं भगवान वामन (नारायण) द्वारपाल के रूप में पहरा दे रहे थे। जब रावण ने युद्ध की इच्छा जताई, तो वामनदेव ने कहा कि पहले सेवक से युद्ध करो, फिर स्वामी से। भगवान ने रावण की छाती पर ऐसी लात मारी कि वह सीधा समुद्र किनारे जा गिरा।

आध्यात्मिक संदेश: रावण 'काम' (वासना) का प्रतीक है। यदि आपकी इंद्रियों के द्वार पर भगवान पहरा देने लगें, तो काम और वासना कभी प्रवेश नहीं कर सकेंगे।

2. नारायण की अनुपस्थिति और लक्ष्मीजी की व्याकुलता

वामन अवतार में भगवान ने बलि से तीन पग भूमि दान में लेकर इंद्र को स्वर्ग का राज्य वापस लौटा दिया था। बलि के सर्वस्व दान से प्रसन्न होकर भगवान उनके ऋणी हो गए और उन्हें पाताल लोक में ही रहने का वरदान देकर स्वयं उनके द्वारपाल बन गए।

इधर वैकुंठ में सब कुछ होते हुए भी माता लक्ष्मी नारायण की अनुपस्थिति से बेचैन थीं। जब नारदजी ने उन्हें बताया कि स्वामी सुतल पाताल में राजा बलि के द्वार पर पहरा दे रहे हैं, तो माता लक्ष्मी उन्हें लेने पाताल लोक की ओर चल पड़ीं।

3. ब्राह्मण कन्या का रूप और रक्षाबंधन का संकल्प

लक्ष्मीजी ने एक ब्राह्मण पत्नी का रूप धारण किया और पाताल लोक पहुँचीं। उन्होंने राजा बलि से कहा कि उनका कोई भाई नहीं है और वे उन्हें अपना धर्म-भाई बनाना चाहती हैं। बलि राजा अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने लक्ष्मीजी को अपनी बहन मान लिया।

श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन माता लक्ष्मी ने राजा बलि की कलाई पर राखी बाँधी। बलि ने प्रसन्न होकर कहा, "बहन, आज माँगो जो माँगना चाहती हो, संकोच मत करो"।

4. नारायण की मुक्ति और चतुर्भुज स्वरूप के दर्शन

लक्ष्मीजी ने विनम्रता से कहा, "मेरे घर में सब कुछ है, बस एक वह नहीं है जिसके बिना मैं अधूरी हूँ। मुझे इस द्वारपाल को दे दो, इन्हें बंधन मुक्त कर दो"। बलि के पूछने पर कि क्या यह द्वारपाल उनका रिश्तेदार है, माता लक्ष्मी ने सत्य प्रकट करते हुए कहा कि ये स्वयं नारायण हैं।

उसी क्षण भगवान चतुर्भुज रूप में प्रकट हुए। राजा बलि ने अत्यंत आनंदित होकर लक्ष्मी-नारायण का पूजन किया और प्रभु को सहर्ष विदा किया।

निष्कर्ष: लक्ष्मी के पीछे नहीं, नारायण के पीछे लगें

इस कथा का सार यह है कि नारायण जहाँ होते हैं, लक्ष्मीजी वहीं आती हैं। यदि आप ठाकुरजी (ईश्वर) को अपने हृदय में बसाएंगे, तो सुख-समृद्धि बिना बुलाए आपके पीछे आएगी। इसलिए संसार में केवल लक्ष्मी (धन) की नहीं, बल्कि नारायण (सत्य और ईश्वर) की आराधना करें।




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