भारत की पावन भूमि पर कई महान संतों ने जन्म लिया, जिन्होंने अपने विचारों से समाज को एक नई दिशा दी। उन्हीं दिव्य संतों में से एक थे संत कबीर दास जी। उनके क्रांतिकारी दोहे और शिक्षाएं आज सदियों बाद भी समाज का मार्गदर्शन कर रही हैं। हर साल ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा तिथि को कबीर दास जी के प्राकट्य दिवस या जयंती के रूप में बेहद हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।
विशेष रूप से कबीरपंथी (कबीर जी के अनुयायी) और साहित्य प्रेमी इस दिन को उत्सव की तरह मनाते हैं। आइए जानते हैं कि वर्ष 2027 में संत गुरु कबीर दास जयंती कब है, इसका शुभ मुहूर्त क्या है और इस दिन का क्या महत्व है।
हिंदू पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ महीने की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को संत कबीर दास जी का जन्म (प्राकट्य) हुआ था।
जयंती की सही तारीख: वर्ष 2027 में कबीर दास जयंती 18 जून 2027 (शुक्रवार) को मनाई जाएगी।
विशेष संयोग: इसी दिन विवाहित महिलाओं का प्रसिद्ध वट पूर्णिमा व्रत भी रखा जाएगा, जिसके कारण ज्येष्ठ पूर्णिमा का धार्मिक महत्व इस दिन कई गुना बढ़ गया है।
पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 18 जून 2027 को सुबह 04:34 बजे से।
पूर्णिमा तिथि समाप्त: 19 जून 2027 को सुबह 06:13 बजे तक।
उदयातिथि के अनुसार, पूर्णिमा तिथि में सूर्योदय 18 जून को हो रहा है और यह पूरे दिन रहेगी, इसलिए कबीर प्रकट दिवस से जुड़े सभी धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम शुक्रवार, 18 जून को ही आयोजित किए जाएंगे।
इतिहासकारों के अनुसार, संत कबीर दास जी का प्राकट्य संवत 1455 (सन 1398) में ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन हुआ था।
लहरतारा तालाब का रहस्य: पौराणिक कथाओं के अनुसार, कबीर जी का जन्म किसी माता के गर्भ से नहीं हुआ था, बल्कि वे काशी के 'लहरतारा तालाब' में एक खिले हुए कमल के फूल पर शिशु रूप में पाए गए थे। नीरू और नीमा नाम के एक निःसंतान जुलाहा (बुनकर) दंपत्ति ने उन्हें वहाँ से उठाया और उनका पालन-पोषण किया।
समाज सुधारक कबीर: कबीर जी एक ऐसे संत थे जिन्होंने हमेशा जात-पात, छुआछूत और खोखले धार्मिक पाखंडों का खुलकर विरोध किया। उन्होंने हमेशा इंसानों को आपस में प्यार से रहने और सच्चे मन से ईश्वर की भक्ति करने की सीख दी।
इस पावन दिन पर देश भर में, विशेष रूप से वाराणसी (काशी) और कबीर चौराहों पर भव्य कार्यक्रमों का आयोजन होता है:
भजन और कीर्तन: कबीरपंथियों के आश्रमों और मंदिरों में सुबह से ही प्रभात फेरी निकाली जाती है और कबीर जी की वाणियों का पाठ होता है।
कबीर दोहा गोष्ठी: कई सांस्कृतिक केंद्रों और स्कूलों में कबीर जी के दोहे गाने और उनकी व्याख्या करने की प्रतियोगिताएं व सेमिनार आयोजित किए जाते हैं।
शोभायात्रा: कई शहरों में कबीर दास जी की भव्य झांकियां और शोभायात्राएं निकाली जाती हैं, जहाँ लोग उनके बताए 'सादा जीवन, उच्च विचार' के मार्ग पर चलने का संकल्प लेते हैं।
1. मीठी वाणी का महत्व:
"ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोए। औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होए॥"
2. वर्तमान में जीने की सीख:
"काल करे सो आज कर, आज करे सो अब। पल में प्रलय होएगी, बहुरि करेगा कब॥"
3. अहंकार का त्याग:
"बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय। जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय॥"
कबीर जी के सटीक जन्म स्थान को लेकर इतिहासकारों के बीच आज भी मतभेद हैं, लेकिन प्रामाणिक और लोक मान्यताओं के अनुसार उनका जन्म पवित्र नगरी काशी (वाराणसी) में हुआ था। इस बात की पुष्टि स्वयं कबीर दास जी ने अपनी एक प्रसिद्ध पंक्ति में की है:
"काशी में परगट भये हैं, रामानन्द चेताये"
(अर्थात, मेरा प्राकट्य काशी में हुआ और स्वामी रामानंद ने मुझे आध्यात्मिक रूप से जगाया।)
संत कबीर दास जी के आध्यात्मिक गुरु स्वामी रामानंद जी थे, जिन्हें कबीर जी ने काशी के घाट पर अपना गुरु स्वीकार किया था।
कबीर दास जी की मुख्य साखियों, सबदों और रमैनी के संग्रह को 'बीजक' (Bijak) कहा जाता है। इसके अलावा उनकी कई वाणियां सिखों के पवित्र 'गुरु ग्रंथ साहिब' में भी संकलित हैं।