हिंदू धर्म में विवाहित महिलाओं के लिए वट पूर्णिमा व्रत (Vat Purnima Vrat) का विशेष महत्व है। यह व्रत पत्नियां अपने पति की लंबी आयु, अच्छी सेहत और सुखी दांपत्य जीवन की कामना के लिए रखती हैं। मुख्य रूप से महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में यह व्रत बेहद धूमधाम से मनाया जाता है।
उत्तर भारत में मनाए जाने वाले 'वट सावित्री व्रत' (जो ज्येष्ठ अमावस्या को होता है) की तरह ही वट पूर्णिमा के दिन भी बरगद (वट) के पेड़ की पूजा की जाती है और माता सावित्री व सत्यवान की कथा सुनी जाती है। आइए जानते हैं कि वर्ष 2027 में वट पूर्णिमा व्रत कब है और इसके शुभ मुहूर्त क्या हैं।
हिंदू पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को वट पूर्णिमा का व्रत रखा जाता है।
व्रत की सही तारीख: वर्ष 2027 में वट पूर्णिमा व्रत 18 जून 2027 (शुक्रवार) को मनाया जाएगा।
पूर्णिमा तिथि और शुभ मुहूर्त:
पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 18 जून 2027 को सुबह 04:34 बजे से।
पूर्णिमा तिथि समाप्त: 19 जून 2027 को सुबह 06:13 बजे तक।
विशेष नोट: चूँकि 18 जून को सूर्योदय के समय पूर्णिमा तिथि मौजूद है और यह पूरे दिन रहने वाली है, इसलिए वट पूर्णिमा का मुख्य व्रत और पूजा शुक्रवार, 18 जून को ही की जाएगी।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन सती सावित्री ने अपने दृढ़ संकल्प और पातिव्रत धर्म के बल पर यमराज से अपने मृत पति सत्यवान के प्राण वापस मांग लिए थे।
बरगद के पेड़ का रहस्य: बरगद के पेड़ को हिंदू शास्त्र में त्रिमूर्ति (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) का रूप माना जाता है। इसकी जटाओं में साक्षात भगवान शिव का वास होता है।
दीर्घायु का वरदान: ऐसा माना जाता है कि जो भी सुहागिन महिला इस दिन वट वृक्ष के चारों ओर सूत का धागा लपेटकर परिक्रमा करती है, उसके पति को लंबी आयु मिलती है और वैवाहिक जीवन की सभी परेशानियां दूर हो जाती हैं।
स्नान और संकल्प: वट पूर्णिमा के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और लाल या पीले रंग के सुंदर सुहाग के वस्त्र धारण करें। इसके बाद व्रत का संकल्प लें।
सामग्री तैयार करें: पूजा की थाली में भीगे हुए चने, फल (विशेषकर आम और केला), कलावा (कच्चा सूत), रोली, अक्षत, धूप-दीप और मिठाई रखें। साथ ही सावित्री और सत्यवान की मिट्टी की मूर्तियां भी रखें।
वट वृक्ष की पूजा: किसी नजदीकी बरगद के पेड़ के पास जाएं। पेड़ की जड़ में जल अर्पित करें, रोली-अक्षत का तिलक लगाएं और फल-फूल चढ़ाएं।
परिक्रमा और धागा बांधना: वट वृक्ष के तने पर कच्चे सूत या कलावे को लपेटते हुए 7, 11, 21 या 108 बार परिक्रमा करें।
कथा श्रवण: पूजा संपन्न करने के बाद वहीं बैठकर सावित्री और सत्यवान की कथा ध्यान से सुनें या पढ़ें। इसके बाद आरती करें और घर के बड़ों का आशीर्वाद लें।
दोनों व्रत का उद्देश्य एक ही है (पति की लंबी आयु), लेकिन उत्तर भारत (यूपी, बिहार, मध्य प्रदेश) में यह व्रत ज्येष्ठ अमावस्या को रखा जाता है जिसे वट सावित्री कहते हैं। वहीं, महाराष्ट्र और गुजरात में इसे ज्येष्ठ पूर्णिमा को मनाया जाता है, जिसे वट पूर्णिमा कहा जाता है।
मुख्य रूप से यह व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए है। हालांकि, कुछ क्षेत्रों में अच्छे पति की कामना के लिए कुंवारी कन्याएं भी इसे रखती हैं।