जब भी नेपाल के धार्मिक स्थलों की बात होती है, तो लोगों के दिमाग में पशुपतिनाथ मंदिर या पहाड़ों पर बने पैगोडा मंदिर आते हैं। लेकिन काठमांडू घाटी में शिवपुरी पहाड़ी की तलहटी में, केंद्र से लगभग 9 किलोमीटर उत्तर में एक ऐसा खुला हुआ मंदिर स्थित है जो वैज्ञानिकों और भक्तों दोनों को हैरत में डाल देता है। इस पवित्र स्थान का नाम है बूढ़ानीलकंठ मंदिर (Budhanilkantha Temple)।
इस मंदिर में कोई बड़ा गर्भगृह या विशाल छत नहीं है। यहाँ का मुख्य आकर्षण एक पानी के कुंड के बीचों-बीच स्थित भगवान विष्णु की एक विशाल और प्राचीन मूर्ति है, जो शेषनाग की शय्या पर विश्राम की मुद्रा में पानी की सतह पर तैरती हुई दिखाई देती है। इस अद्भुत नजारे को देखना अपने आप में एक दिव्य अनुभव है।
नाम 'बूढ़ानीलकंठ' का शाब्दिक अर्थ होता है "बूढ़े नीलकंठ यानी भगवान शिव" (जिन्होंने विषपान किया था)। लेकिन इस मंदिर के मुख्य देवता साक्षात भगवान विष्णु हैं, जिन्हें यहाँ ब्रह्मांडीय निद्रा की मुद्रा में पूजा जाता है, जिसे 'जलशयन नारायण' कहा जाता है।
यह दिव्य मूर्ति काले बेसाल्ट पत्थर के एक ही विशाल टुकड़े को तराशकर बनाई गई है। इतिहासकारों के अनुसार, यह मूर्ति लगभग 1400 वर्ष से भी अधिक पुरानी है, जिसका निर्माण लिच्छवि राजवंश के दौरान किया गया था।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, समय के साथ यह प्राचीन मूर्ति मिट्टी में दफन हो गई थी। सदियों पहले, एक स्थानीय किसान और उसकी पत्नी इस क्षेत्र में अपने खेत की जुताई कर रहे थे। अचानक उनके हल का नुकीला हिस्सा जमीन के अंदर एक बड़े पत्थर से टकराया। जैसे ही हल टकराया, उस स्थान से खून बहने लगा। जब उन्होंने घबराकर वहां की मिट्टी को खोदा, तो जमीन के अंदर से भगवान नारायण की यह विशाल और मुस्कुराती हुई मूर्ति प्रकट हुई। इसके तुरंत बाद वहां इस पवित्र कुंड और मंदिर की स्थापना की गई।
भगवान विष्णु की यह भव्य मूर्ति लगभग 5 मीटर (16.4 फीट) लंबी है, जो 13 मीटर लंबे एक चौकोर पानी के तालाब (कुंड) के बीच में स्थित है।
ब्रह्मांडीय सर्प शेषनाग: भगवान विष्णु ब्रह्मांडीय सर्पराज शेषनाग की ग्यारह कुंडलियों (फोल्ड्स) पर लेटे हुए हैं। शेषनाग के ये 11 फन माता लक्ष्मी के स्वामी भगवान विष्णु के सिर के ऊपर एक सुरक्षात्मक छतरी (छत्र) की तरह फैले हुए हैं।
चतुर्भुज रूप: भगवान के चारों हाथों में उनके पारंपरिक प्रतीक मौजूद हैं: सुदर्शन चक्र, पांचजन्य शंख, कमल का फूल और कौमोदकी गदा।
विज्ञान और आस्था का अनोखा मेल: सालों से यह बात कौतूहल का विषय रही है कि इतनी भारी पत्थर की मूर्ति पानी पर कैसे तैर सकती है। अतीत में, कुछ वैज्ञानिकों ने इस पत्थर के छोटे से हिस्से का परीक्षण किया था। शोध में सामने आया कि यह पत्थर सिलिका और कम घनत्व वाले छिद्रयुक्त ज्वालामुखी पत्थरों (Porous Volcanic Rock) जैसा है, जो पानी में तैर सकते हैं। हालांकि, भक्त इसे पूरी तरह से भगवान का साक्षात चमत्कार मानते हैं।
इस मंदिर के साथ इतिहास का एक बहुत ही दिलचस्प और कड़ा नियम जुड़ा हुआ है: नेपाल के राजपरिवार या राजाओं को इस मूर्ति को देखने की सख्त मनाही थी।
किंवदंती है कि 17वीं शताब्दी के प्रतापी राजा प्रताप मल्ल को एक दिव्य स्वप्न आया था। सपने में उन्हें चेतावनी दी गई थी कि यदि नेपाल के किसी भी राजा ने बूढ़ानीलकंठ विष्णु की आंखों में आंखें डालकर उनके दर्शन किए, तो उनके और उनके वंशज की तुरंत और अकाल मृत्यु हो जाएगी। इस शाप के डर से, नेपाल के किसी भी राजा ने कभी इस मंदिर के परिसर में पैर नहीं रखा। राजपरिवार के पूजन के लिए काठमांडू में ही इस मूर्ति की एक हूबहू प्रतिकृति (Replica) बनाई गई थी।
यूँ तो यहाँ रोज़ सुबह भक्तों का तांता लगा रहता है, लेकिन शरद ऋतु (Late Autumn) के दौरान यहाँ की रौनक देखने लायक होती है:
हरिबोधिनी एकादशी (Haribodhini Ekadashi): अक्टूबर या नवंबर के महीने में आने वाली इस एकादशी को सबसे बड़ा उत्सव माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु अपनी चार महीने की योग निद्रा (चातुर्मास) से जागते हैं। इस दिन यहाँ हजारों भक्त भगवान को तुलसी दल, फूल और फल चढ़ाने आते हैं।
आध्यात्मिक सुकून: सुबह के समय यहाँ का वातावरण बेहद शांत और मनमोहक होता है। पुजारियों द्वारा वैदिक मंत्रों का उच्चारण, पानी के ऊपर तैरती अगरबत्ती की महक और कुंड के साफ पानी में भगवान विष्णु के शांत चेहरे का प्रतिबिंब भक्तों के मन को असीम शांति देता है।
कैसे पहुँचें: बूढ़ानीलकंठ काठमांडू के केंद्र से बेहद नजदीक है। आप रत्ना पार्क बस स्टेशन से स्थानीय बस ले सकते हैं या सीधे प्राइवेट टैक्सी के ज़रिए 25-30 मिनट में यहाँ पहुँच सकते हैं।
प्रवेश और फोटोग्राफी: मंदिर परिसर में प्रवेश बिल्कुल मुफ्त है। बाहर से परिसर की तस्वीरें ली जा सकती हैं, लेकिन धार्मिक आस्था के सम्मान में मुख्य मूर्ति वाले पानी के कुंड के पास जाकर क्लोज-अप फोटो खींचना मना है।
पोशाक नियम: भक्तों से शालीन कपड़े पहनने की उम्मीद की जाती है। चमड़े की वस्तुएं (जैसे बेल्ट या पर्स) मुख्य जल परिसर के पास ले जाना पूरी तरह वर्जित है।