सावन का महीना जब झूमकर बरसता है और चारों तरफ हरियाली की चादर बिछ जाती है, तो मन में एक अलग ही उमंग भर जाती है। इसी पावन मौसम में सावन शुक्ल तृतीया को 'हरियाली तीज' मनाई जाती है। इस साल यह पवित्र पर्व 15 अगस्त 2026 (शनिवार) को पड़ रहा है।
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हरियाली तीज सिर्फ महिलाओं के सजने-संवरने, झूला झूलने या मेहंदी लगाने का त्योहार है, या इसके पीछे कोई गहरा आध्यात्मिक रहस्य और प्रेम की अमर कहानी छिपी है? आइए इसे आसान और दिल से महसूस होने वाले अंदाज में समझते हैं।
हरियाली तीज मनाए जाने की सबसे मुख्य वजह है— माता पार्वती और भगवान शिव का दिव्य पुनर्मिलन।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए एक-दो नहीं, बल्कि 108 जन्मों तक कठोर तपस्या की थी। उन्होंने जंगलों में रहकर कड़े कष्ट सहे, बर्फ की ठंड में तप किया और हवा-पत्ते खाकर दिन बिताए।
माता पार्वती की इस अटूट भक्ति, धैर्य और निष्ठा को देखकर सावन महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया था। इसलिए, यह दिन केवल एक पर्व नहीं, बल्कि सच्चे प्रेम, त्याग और भक्ति की जीत का प्रतीक है।
सनातन परंपरा में हरियाली तीज का महत्व 3 बड़े स्तंभों पर टिका है:
अखंड सौभाग्य की प्राप्ति: शादीशुदा महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के लिए यह निर्जला या फलाहारी व्रत रखती हैं।
मनोवांछित जीवनसाथी (मनचाहा वर): कुंवारी लड़कियां भी इस दिन माता पार्वती की पूजा करती हैं और व्रत रखती हैं ताकि उन्हें भगवान शिव जैसा समर्पित और प्रेम करने वाला जीवनसाथी मिले।
प्रकृति और शिव का संबंध: 'हरियाली' शब्द प्रकृति के नए जन्म का प्रतीक है। सावन की बारिश से धरती हरी-भरी हो जाती है। सनातन धर्म में प्रकृति को 'माता पार्वती' (शक्ति) और आकाश/मानस को 'शिव' माना गया है। इसलिए यह पर्व प्रकृति (Nature) और पुरुष (Cosmic Being) के मिलन का उत्सव है।
हरियाली तीज पर महिलाएं हरे रंग की साड़ी, कांच की हरी चूड़ियां और 16 श्रृंगार करती हैं।
हरा रंग: खुशहाली, नए जीवन, शांति और प्रकृति का प्रतीक है।
16 श्रृंगार: यह सिर्फ सुंदरता के लिए नहीं है, बल्कि यह सौभाग्य, सकारात्मक ऊर्जा और पति-पत्नी के रिश्ते में ताजगी लाने का संकेत है।
इस दिन नवविवाहित बेटियों के लिए उनके मायके (माता-पिता के घर) से वस्त्र, श्रृंगार का सामान, घेवर, मिठाई और फल भेजे जाते हैं, जिसे 'सिंधारा' कहा जाता है। यह परंपरा मायके और ससुराल के बीच प्यार और मिठास को मजबूत करती है।
सावन में पेड़ों पर झूले डाले जाते हैं। महिलाएं और सखियां एक साथ एकत्रित होकर झूला झूलती हैं और पारंपरिक तीज गीत गाती हैं। यह परंपरा हमें सिखाती है कि भक्ति में आनंद और अपनों के साथ का होना कितना जरूरी है।
हरियाली तीज हमें सिखाती है कि सच्चा रिश्ता और प्यार रातों-रात नहीं बनता, उसके लिए माता पार्वती जैसा 'धैर्य' (Patience) और 'समर्पण' (Dedication) चाहिए। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में यह पर्व हमें अपने रिश्तों में फिर से वही मिठास, सम्मान और ताजगी भरने का मौका देता है।
सभी माताओं-बहनों को हरियाली तीज की हार्दिक शुभकामनाएं! 🌿🚩