हर साल जब फाल्गुन या सावन मास में शिवरात्रि का पावन अवसर आता है, तो पूरे देश के शिवालय 'हर-हर महादेव' और 'जय भोलेनाथ' के जयकारों से गूंज उठते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हम हर साल इतनी श्रद्धा और धूमधाम से महाशिवरात्रि क्यों मनाते हैं?
बहुत से लोग मानते हैं कि इस दिन केवल शिव-पार्वती का विवाह हुआ था, लेकिन सनातन धर्म और पौराणिक ग्रंथों के अनुसार इसके पीछे 4 बड़ी कथाएं और गहरा आध्यात्मिक रहस्य छिपा है। आइए आसान शब्दों में समझते हैं।
महाशिवरात्रि मनाए जाने का सबसे मुख्य और लोकप्रिय कारण भगवान शिव और माता पार्वती का शुभ विवाह है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता शक्ति ने सती रूप के बाद पर्वतराज हिमालय की पुत्री 'पार्वती' के रूप में पुनर्जन्म लिया था। भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए उन्होंने वर्षों तक कठोर तपस्या की। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी के दिन ही भगवान शिव ने माता पार्वती की भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया था। इसी खुशी में हर साल महाशिवरात्रि को शिव जी की बारात और विवाह के उत्सव के रूप में मनाया जाता है।
देवताओं और असुरों द्वारा किए गए समुद्र मंथन की कथा तो हम सबने सुनी है। जब समुद्र मंथन से भयानक 'हलाहल विष' निकला, तो उसकी अग्नि से तीनों लोक जलने लगे।
सृष्टि को तबाही से बचाने के लिए महादेव ने बिना एक पल सोचे उस भयंकर विष को स्वयं पी लिया। लेकिन विष की गर्मी से ब्रह्मांड को बचाने के लिए उन्होंने इसे अपने गले (कंठ) में ही रोक लिया। विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया और वे 'नीलकंठ' कहलाए। जिस रात शिव जी ने पूरे संसार की रक्षा के लिए यह विष पिया था, वह रात शिवरात्रि की रात ही थी। इसलिए उनके प्रति आभार व्यक्त करने के लिए भी यह पर्व मनाया जाता है।
एक अन्य कथा के अनुसार, एक बार ब्रह्मा जी और विष्णु जी के बीच श्रेष्ठता को लेकर विवाद हो गया। तब उनके भ्रम को दूर करने के लिए भगवान शिव एक अनंत 'अग्नि स्तंभ' (प्रकाश लिंग) के रूप में प्रकट हुए, जिसका न तो कोई आदि था और न ही कोई अंत।
जिस दिन यह दिव्य ज्योतिर्लिंग प्रकट हुआ था, वह दिन महाशिवरात्रि का ही था। इसीलिए इस दिन शिवलिंग का जलाभिषेक और पूजन करने का विशेष महत्व है।
महाशिवरात्रि का दिन केवल उत्सव का नहीं, बल्कि शिव के तांडव और शांति के संतुलन का प्रतीक है। शिव जो पहले एक वैरागी अघोरी की तरह श्मशान और कैलाश पर ध्यान में लीन रहते थे, इस दिन वे गृहस्थ जीवन में प्रवेश करते हैं। यह दिन हमें सिखाता है कि कैसे वैराग्य और गृहस्थ धर्म दोनों को संतुलन में रखकर जिया जा सकता है।
महाशिवरात्रि सिर्फ उपवास रखने या जल चढ़ाने का दिन नहीं है, बल्कि यह अपने भीतर के अंधकार (अज्ञानता) को मिटाकर प्रकाश (ज्ञान) की ओर बढ़ने की रात है। जब आप शिव मंदिर जाएं, तो सिर्फ मन्नतें न मांगें, बल्कि शिव के उस त्याग और निस्वार्थ प्रेम को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें।
हर-हर महादेव! 🚩