सीकर, राजस्थान: राजस्थान की अरावली पहाड़ियों में पूजी जाने वाली जीण माता और उनके भाई हर्ष भैरव की कहानी केवल भक्ति की नहीं, बल्कि भाई-बहन के उस अटूट प्रेम की है, जिसने उनकी जीवन दिशा ही बदल दी। यह कथा हमें सिखाती है कि कभी-कभी छोटे से मनमुटाव भी जीवन को एक नया मोड़ दे देते हैं।
यह उस समय की बात है, जब जीण और उनके भाई हर्ष अपनी भाभी के साथ एक ही घर में रहते थे। हर्ष का विवाह हो चुका था, और उनके परिवार में सब खुशी-खुशी रह रहे थे। जीण और हर्ष के बीच गहरा स्नेह था, जो अक्सर लोकगीतों में भी गाया जाता है।
एक दिन, हर्ष की पत्नी (जीण की भाभी) और जीण पानी भरने के लिए कुएं पर गईं। दोनों ने पानी के घड़े भर लिए। घर लौटते समय, रास्ते में एक गहरी खाई थी। घड़ों को उतारने के लिए दोनों में इस बात को लेकर बहस हो गई कि पहले कौन किसका घड़ा उतारेगा। भाभी ने कहा, "मैं पहले अपने पति (हर्ष) का घड़ा उतारूँगी, क्योंकि वे मेरे पति हैं।" जीण ने जवाब दिया, "मैं भी पहले अपने भाई (हर्ष) का ही घड़ा उतारूँगी, क्योंकि वे मेरे भाई हैं।"
यह एक छोटी सी बात थी, लेकिन इसने एक गहरे भाव को जन्म दिया।
जब दोनों घर लौटीं, तो हर्ष ने देखा कि उनकी पत्नी ने पहले अपना घड़ा उतारा है और जीण का घड़ा अभी भी ऊपर है। हर्ष ने अपनी पत्नी से पूछा कि उसने पहले जीण का घड़ा क्यों नहीं उतारा। इस पर भाभी ने कहा, "मैंने अपने पति का घड़ा पहले उतारा है, और जीण ने भी अपने भाई का घड़ा उतारना चाहा था। अब आप ही बताएँ कि आपके लिए आपकी पत्नी का प्रेम बड़ा है या बहन का?"
हर्ष धर्मसंकट में पड़ गए। पत्नी के प्रति अपने कर्तव्य और बहन के प्रति अपने स्नेह के बीच वे कुछ कह न सके। उनके इस मौन ने जीण को बहुत आहत किया। जीण को लगा कि भाई के जीवन में अब उनकी पत्नी का स्थान अधिक महत्वपूर्ण हो गया है, और उनके प्रेम की अब पहले जैसी कीमत नहीं रही।
जीण का हृदय इस घटना से इतना विचलित हुआ कि उन्होंने सांसारिक जीवन त्यागने का निर्णय ले लिया। वे घर छोड़कर अरावली की पहाड़ियों की ओर चल पड़ीं, जहाँ उन्होंने कठोर तपस्या का संकल्प लिया।
जब हर्ष को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्हें अपनी बहन के विचलित मन का पता चला, तो वे अपनी बहन को मनाने के लिए पहाड़ियों में उनके पीछे गए। उन्होंने जीण को वापस लौटने के लिए बहुत समझाया, लेकिन जीण अपने निर्णय पर अडिग थीं।
जब हर्ष ने देखा कि उनकी बहन वापस लौटने को तैयार नहीं हैं, तो उन्होंने भी वहीं पास की एक और पहाड़ी पर बैठकर तपस्या करने का निर्णय लिया। उन्होंने ठान लिया कि वे अपनी बहन के साथ ही तपस्या करेंगे।
जीण की तपस्या इतनी तीव्र थी कि उन्हें देवी शक्ति के रूप में सिद्धि प्राप्त हुई। वहीं, भाई हर्ष भी अपनी तपस्या के बल पर 'भैरव' के रूप में पूजे जाने लगे।
आज भी जीण माता का मंदिर सीकर के रैवासा गांव के पास पहाड़ी पर स्थित है, जहाँ वे अष्टभुजी देवी के रूप में भक्तों को दर्शन देती हैं। वहीं, पास की दूसरी पहाड़ी पर उनके भाई हर्ष, 'हर्षनाथ भैरव' के रूप में पूजे जाते हैं। यह कथा भाई-बहन के उस दिव्य प्रेम का प्रतीक है, जो सांसारिक बंधनों से ऊपर उठकर अमर हो गया। यह हमें सिखाती है कि रिश्ते अनमोल होते हैं और उन्हें कभी भी छोटी बातों पर टूटने नहीं देना चाहिए।