नई दिल्ली: 19 मार्च 2026 से विक्रम संवत 2083 का प्रारंभ हो रहा है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होने वाला यह वर्ष न केवल काल गणना की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक पहचान और आध्यात्मिक चेतना का भी प्रतीक है। आइए जानते हैं इस नववर्ष का महत्व और इसे मनाने के पारंपरिक तरीके।
इस वर्ष का प्रारंभ गुरुवार से हो रहा है, जो देवगुरु बृहस्पति का दिन है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, नववर्ष का प्रारंभ जिस दिन होता है, उस दिन के स्वामी ही पूरे वर्ष के "राजा" कहलाते हैं।
राजा और मंत्री: संवत 2083 के राजा गुरु (बृहस्पति) होंगे, जो ज्ञान, धर्म और समृद्धि के प्रतीक हैं।
प्रकृति का नवजीवन: चैत्र मास में वसंत ऋतु अपने चरम पर होती है, पेड़ों पर नई पत्तियां आती हैं और प्रकृति स्वयं को पुनर्जीवित करती है।
हिंदू नववर्ष को केवल एक तिथि की तरह नहीं, बल्कि एक उत्सव की तरह मनाना चाहिए। इसकी तैयारी आप अभी से शुरू कर सकते हैं:
घर की शुद्धि और सजावट: नववर्ष से पूर्व घर की साफ-सफाई करें। 19 मार्च की सुबह मुख्य द्वार पर आम या अशोक के पत्तों का बंदनवार (तोरण) लगाएं। यह नकारात्मक ऊर्जा को रोकता है।
गुड़ी पड़वा और ध्वज स्थापना: अपने घर की छत या बालकनी पर रेशमी वस्त्र और नीम की पत्तियों से सजा हुआ धर्म ध्वज फहराएं। यह विजय और उन्नति का प्रतीक है।
कड़वे नीम का सेवन: परंपरा के अनुसार, नववर्ष के पहले दिन नीम की कोमल पत्तियों को गुड़ और मिश्री के साथ चबाया जाता है। यह शरीर को रोगों से लड़ने की शक्ति प्रदान करता है और जीवन के सुख-दुख को समान भाव से स्वीकार करने की प्रेरणा देता है।
कलश स्थापना और नवरात्रि: इसी दिन से चैत्र नवरात्रि का भी प्रारंभ होता है। अतः माता दुर्गा की आराधना के लिए घटस्थापना की तैयारी पहले से कर लें।
ब्रह्म मुहूर्त में स्नान: पवित्र नदियों या घर में ही गंगाजल डालकर स्नान करें।
सूर्य अर्घ्य: नए वर्ष के पहले सूर्य को जल अर्पित कर सुख-समृद्धि की कामना करें।
पंचांग श्रवण: आज के दिन नए पंचांग का पूजन करें और वर्ष भर के फलों का श्रवण करें।