देवघर (झारखंड): भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक, बाबा बैद्यनाथ धाम की महिमा निराली है। यह न केवल एक ज्योतिर्लिंग है, बल्कि एक सिद्ध शक्तिपीठ भी है। इस पावन तीर्थ के पीछे छिपी रावण की तपस्या और महादेव की दयालुता की कहानी आज भी करोड़ों भक्तों को प्रेरित करती है।
लंका का राजा रावण भगवान शिव का परम भक्त था। उसकी इच्छा थी कि महादेव सदैव के लिए लंका में निवास करें ताकि उसकी नगरी अजेय बन जाए। इस संकल्प के साथ रावण ने हिमालय में वर्षों तक घोर तपस्या की। जब शिवजी प्रसन्न नहीं हुए, तो रावण ने अपनी भक्ति सिद्ध करने के लिए एक-एक कर अपने दसों सिर काटकर शिवलिंग पर अर्पित करने शुरू कर दिए। जब वह अपना दसवाँ और अंतिम सिर काटने ही वाला था, तब महादेव प्रकट हुए।
शिवजी ने रावण को वरदान माँगने को कहा, तो रावण ने उन्हें अपने साथ लंका चलने की प्रार्थना की। महादेव ने उसे एक विशेष शिवलिंग दिया और एक शर्त रखी:
"इसे लंका ले जाओ, लेकिन ध्यान रखना—रास्ते में यदि इसे कहीं भी धरती पर रखा, तो यह वहीं स्थिर हो जाएगा।"
देवताओं को भय था कि यदि रावण सफल हुआ तो वह अधर्म बढ़ाएगा। तब भगवान विष्णु की सहायता से वरुण देव ने रावण के पेट में प्रवेश किया, जिससे उसे तीव्र लघुशंका महसूस हुई। विवश होकर रावण ने एक ग्वाले (जो वास्तव में भगवान गणेश थे) को शिवलिंग पकड़ा दिया। अवसर पाकर गणेशजी ने शिवलिंग धरती पर रख दिया। रावण ने उसे उठाने की बहुत कोशिश की, लेकिन महादेव की शर्त के अनुसार वे वहीं स्थापित हो गए।
वैद्य के रूप में शिव: मान्यता है कि जब रावण ने अपने सिर काटे थे, तब भगवान शिव ने स्वयं वैद्य (डॉक्टर) बनकर उसके घावों को भरा था। इसी कारण उन्हें 'बैद्यनाथ' (वैद्य + नाथ) कहा गया।
हृदय पीठ: बैद्यनाथ धाम को एक महत्वपूर्ण शक्तिपीठ भी माना जाता है। कहा जाता है कि यहाँ माता सती का हृदय गिरा था।
मनोकामना लिंग: यह स्थान भक्तों की हर मनोकामना पूर्ण करने वाला माना जाता है।
कांवड़ यात्रा: सावन मास में यहाँ लाखों भक्त सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर पैदल यात्रा करते हैं और बाबा का जलाभिषेक करते हैं।
कष्टों से मुक्ति: यहाँ पूजा करने से रोगों, मानसिक कष्टों और दुखों से मुक्ति मिलती है।