द्वारिका/वृंदावन: सनातन धर्म में 'प्रारब्ध' (भाग्य) को अटल माना गया है, लेकिन भक्तवत्सल भगवान श्रीकृष्ण ने सुदामा के प्रसंग में यह सिद्ध कर दिया कि प्रेमपूर्ण 'कर्म' भाग्य की रेखाओं को भी मिटा सकता है। आइए जानते हैं वह प्रसंग जब यमराज स्वयं अपने बहीखाते लेकर द्वारिका पहुँचे।
जब भगवान श्रीकृष्ण ने सुदामा जी की भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें तीनों लोकों का स्वामी बना दिया, तो यमराज असमंजस में पड़ गए। वे अपने बहीखाते लेकर द्वारिका पहुँचे और प्रभु से बोले— "भगवन, यदि आप इसी प्रकार पापियों को क्षमा कर सीधे अपने धाम बुला लेंगे और सुदामा जैसे दरिद्र व्यक्ति को तीनों लोकों की संपत्ति दे देंगे, तो यमपुरी में मेरी क्या आवश्यकता? विधि का विधान तो अब समाप्त ही होता दिख रहा है।"
यमराज ने तर्क दिया कि सुदामा के प्रारब्ध में तो आजीवन दरिद्रता लिखी थी। तब भगवान ने मुस्कुराते हुए यमराज को अपना बहीखाता फिर से देखने को कहा। यमराज ने जब पन्ना खोला तो दंग रह गए।
लेख का पलटना: जहाँ सुदामा के भाग्य में 'श्रीक्षय' (संपत्ति का नाश) लिखा था, वहाँ स्वयं प्रभु ने अक्षरों को उलटकर 'यक्षश्री' (कुबेर की संपत्ति) लिख दिया था।
प्रभु का तर्क: भगवान बोले, "यमराज, सुदामा ने मुझे अपना सर्वस्व अर्पण कर दिया था। उसने प्रेम से मुझे जो चावल खिलाए, वह उसकी कुल पूंजी थी।"
भगवान श्रीकृष्ण ने यमराज को समझाया कि जो मुझे प्रेम से कुछ खिलाता है, उसे संपूर्ण विश्व को भोजन कराने जितना पुण्य प्राप्त होता है। सुदामा के उन मुट्ठी भर चावलों का प्रतिफल ही यह अथाह संपत्ति है। प्रभु की इसी दयालुता के कई उदाहरण हैं:
द्रौपदी की बटलोई: द्रौपदी की बटलोई में बचे साग के एक पत्ते को खाकर प्रभु ने दुर्वासा ऋषि और उनके हजारों शिष्यों सहित पूरे ब्रह्मांड को तृप्त कर दिया था और पांडवों को श्राप से बचाया था।
यह कथा हमें सिखाती है कि भगवान वस्तु के भूखे नहीं, भाव के भूखे हैं। जब मनुष्य निस्वार्थ भाव से अपना 'कर्म' प्रभु को अर्पित करता है, तो भगवान उसके भाग्य की दरिद्रता को 'यक्षश्री' में बदल देते हैं।
बोलिए द्वारिकाधीश भगवान की जय! 🙏🌹