बटुक भैरवी जयंती 2026: जानिए तारीख, ज्येष्ठ पूर्णिमा का शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और धार्मिक महत्व

सनातन धर्म की शाक्त और तंत्र परंपरा में गुप्त और अत्यंत प्रभावशाली शक्तियों की आराधना का विशेष महत्व है। इन्हीं महाशक्तियों में से एक हैं माँ बटुक भैरवी, जो भगवान शिव के बाल स्वरूप 'बटुक भैरव' की आदिशक्ति मानी जाती हैं। हर साल ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा तिथि को 'बटुक भैरवी जयंती' (Batuka Bhairavi Jayanti) के रूप में बेहद श्रद्धा और पवित्रता के साथ मनाया जाता है।

वर्ष 2026 में यह पावन जयंती कल, 29 जून 2026 (सोमवार) को मनाई जाएगी। जो भक्त या साधक अपने जीवन से भय, अकाल मृत्यु का डर, तंत्र बाधा और नकारात्मक ऊर्जा को पूरी तरह समाप्त करना चाहते हैं, उनके लिए यह दिन एक महान अवसर की तरह होता है। आइए, 'द डिवाइन इंडिया' के इस विशेष लेख में जानते हैं बटुक भैरवी जयंती का शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और इसका महत्व।

1. बटुक भैरवी जयंती 2026: तिथि और शुभ मुहूर्त (Auspicious Timings)

पंचांग और ज्योतिषीय गणना के अनुसार, ज्येष्ठ पूर्णिमा तिथि का विवरण इस प्रकार है:

  • पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 28 जून 2026 को शाम 04:36 बजे से।

  • पूर्णिमा तिथि समाप्त: 29 जून 2026 को शाम 06:56 बजे तक।

  • उदयातिथि के अनुसार व्रत: चूंकि सूर्योदय के समय पूर्णिमा तिथि 29 जून 2026 (सोमवार) को मौजूद रहेगी, इसलिए इसी दिन बटुक भैरवी जयंती का पर्व और व्रत मनाया जाएगा।

2. कौन हैं माँ बटुक भैरवी? (पौराणिक महत्व)

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब ब्रह्मांड में नकारात्मक शक्तियों और असुरों का प्रकोप बहुत अधिक बढ़ गया था, तब भगवान शिव ने संसार की रक्षा के लिए आनंदभैरव (बटुक भैरव) का रूप धारण किया था। उन्हीं की शक्ति के रूप में माँ आदिशक्ति ने 'बटुक भैरवी' का स्वरूप लिया।

यह स्वरूप सौम्य और उग्र दोनों का अद्भुत संतुलन है। जहाँ एक तरफ माता अपने भक्तों के लिए ममतामयी और कल्याणकारी हैं, वहीं दुष्ट शक्तियों और जीवन की बाधाओं के लिए वे काल के समान हैं। इस दिन उनकी पूजा करने से कुंडली के राहु-केतु और शनि के अशुभ प्रभाव भी शांत हो जाते हैं।

3. कैसे करें पूजा? (Simple Steps of Puja Vidhi)

घर के मंदिर में सामान्य भक्त भी सात्विक रूप से इनकी पूजा कर सकते हैं:

  1. सुबह का स्नान: कल सुबह (29 जून) जल्दी उठकर स्नान करें और साफ लाल या पीले रंग के वस्त्र धारण करें।

  2. चौकी की स्थापना: एक साफ चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं और माँ दुर्गा या माँ भैरवी की तस्वीर स्थापित करें। साथ ही यदि भगवान शिव या बटुक भैरव की मूर्ति हो, तो उसे भी पास में रखें।

  3. अर्चना और भोग: माता को कुमकुम, लाल चंदन, अक्षत और लाल फूल (जैसे गुड़हल বা गुलाब) अर्पित करें। भोग में माता को ऋतु फल (जैसे आम), सात्विक मिठाई या हलवे का भोग लगाएं।

  4. दीपक और मंत्र: गाय के घी का या सरसों के तेल का एक दीपक जलाएं। इसके बाद माँ दुर्गा के नवार्ण मंत्र या भैरवी मंत्र का शांत मन से जाप करें।

  5. आरती: पूजा के अंत में माता की आरती करें और अनजाने में हुई भूलचूक के लिए क्षमा मांगें।




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