देवी दक्षिणामूर्ति जयंती 2026: 29 जुलाई को है देवी दक्षिणामूर्ति जयंती, जानिए शुभ मुहूर्त, मौन साधना और इसका विशेष महत्व

सनातन धर्म में आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि का विशेष आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व माना गया है। इसी पावन तिथि पर द्वादश सिद्धविद्याओं में से एक देवी दक्षिणामूर्ति की जयंती मनाई जाती है। मान्यता है कि बिना देवी दक्षिणामूर्ति की उपासना के सिद्धविद्या की साधना अधूरी मानी जाती है।

शास्त्रों के अनुसार, भगवान शिव ने सनकादि ऋषियों को ब्रह्मज्ञान प्रदान करने के लिए दक्षिणामूर्ति रूप धारण किया था। इसीलिए विद्वान देवी दक्षिणामूर्ति को भगवान शिव की इसी दिव्य शक्ति (शक्ति स्वरूप) के रूप में पूजते हैं। आइए जानते हैं साल 2026 में देवी दक्षिणामूर्ति जयंती की सही तारीख, पूर्णिमा तिथि का समय और पूजा का महत्व।

📅 दक्षिणामूर्ति जयंती 2026: तिथि और शुभ मुहूर्त (Dates & Timings)

पंचांग की सटीक गणना के अनुसार, साल 2026 में आषाढ़ पूर्णिमा तिथि का समय इस प्रकार रहेगा:

  • दक्षिणामूर्ति जयंती मुख्य तारीख: 29 जुलाई 2026 (बुधवार)

  • पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 28 जुलाई 2026 को शाम 06:18 बजे से

  • पूर्णिमा तिथि समाप्त: 29 जुलाई 2026 को रात 08:05 बजे तक

🧘 मौन साधना और उपासना का विशेष महत्व (Importance of Silence)

दक्षिणामूर्ति पूजन का मूल सार 'मौन' (Silence) में निहित है।

  1. मौन व्रत व आत्मचिंतन: जयंती के दिन साधक को यथासंभव मौन धारण करना चाहिए और अपना समय ध्यान, आत्मचिंतन और मंत्र जाप में बिताना चाहिए।

  2. अज्ञानता का नाश: देवी दक्षिणामूर्ति की साधना से व्यक्ति के अंतर्मन में छिपा अज्ञान रूपी अंधकार दूर होता है और आत्म-साक्षात्कार (Self-Realization) का प्रकाश प्रज्वलित होता है।

  3. विद्या और आध्यात्मिक उन्नति: इस दिन सच्चे मन से उपासना करने पर साधक को जीवन के हर क्षेत्र में सफलता, ज्ञान और आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति होती है।

📿 पूजा विधि और श्लोक (Puja Vidhi)

  • सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और मन ही मन देवी का ध्यान करें।

  • मां के समक्ष दीपक जलाकर फल, पुष्प और सात्विक भोग अर्पित करें।

  • शांत भाव से बैठकर इस विशेष श्लोक का पाठ करें:

वन्दितां सकलैर्देविः सर्वशक्ति शिखामणिम्।

वरं दास्यामि ते कृष्ण प्रसन्नवदनो भाव॥

हिंदी में अर्थ:

  • प्रथम पंक्ति (वन्दितां सकलैर्देविः सर्वशक्ति शिखामणिम्):

    "जो देवी सभी देवियों और शक्तियों द्वारा पूजित (वंदनीय) हैं तथा समस्त शक्तियों में शिरोमणि (सर्वश्रेष्ठ/शिखर के मणि के समान) हैं..."

  • द्वितीय पंक्ति (वरं दास्यामि ते कृष्ण प्रसन्नवदनो भव):

    "...(हे कृष्ण!) प्रसन्नचित्त और प्रसन्न मुख होकर मैं तुम्हें वरदान देता/देती हूँ।"

सरल शब्दों में भावार्थ:

यह श्लोक उस परम देवी की महिमा को दर्शाता है, जो संपूर्ण ब्रह्मांड की समस्त शक्तियों में सर्वोपरि और पूजनीय हैं। भगवान या देवी प्रसन्न होकर (हे कृष्ण/हे साधक) सौम्य व प्रसन्न मुद्रा में अपने भक्त को मनोवांछित वरदान प्रदान करते हैं।

🎯 लेखक के विचार (Author's Take)

ज्ञान और आत्म-साक्षात्कार की चाह रखने वाले प्रत्येक साधक के लिए देवी दक्षिणामूर्ति की आराधना बहुत कल्याणकारी मानी जाती है। इस 29 जुलाई को थोड़ा समय मौन रहकर आत्मचिंतन करें और देवी का आशीर्वाद प्राप्त करें।




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