कर्नाटक के इस मंदिर में मछलियों की होती है पूजा, नथ पहनाकर छोड़ी जाती हैं नदी में; जानिए ‘भगवान की मछली’ की अनोखी परंपरा

चिक्कामगलुरु, कर्नाटक: भारत अपनी विविध संस्कृति और अनोखी धार्मिक परंपराओं के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। यहाँ कहीं पत्थरों की पूजा होती है, तो कहीं जानवरों की। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कर्नाटक के चिक्कामगलुरु जिले में एक ऐसा मंदिर है, जहाँ नदियों में रहने वाली मछलियों को 'भगवान' मानकर पूजा जाता है? इतना ही नहीं, यहाँ मन्नत पूरी होने पर मछलियों को सोने या चांदी की नथ (Nose Ring) पहनाने की एक अद्भुत परंपरा सदियों से चली आ रही है।

श्री शृंगेरी शारदा पीठम और तुंगा नदी का चमत्कार

यह परंपरा चिक्कामगलुरु जिले के शृंगेरी में स्थित प्रसिद्ध शारदा पीठम के पास बहने वाली तुंगा नदी के तट पर देखी जाती है। इस स्थान को 'मत्स्य तीर्थ' के नाम से भी जाना जाता है।

  • भगवान की मछली: यहाँ नदी के घाटों पर हज़ारों की संख्या में मछलियाँ (जिन्हें स्थानीय स्तर पर 'मीन' कहा जाता है) मौजूद रहती हैं। श्रद्धालुओं का मानना है कि ये मछलियाँ देवी शारदा की रक्षक हैं और इनमें दैवीय अंश है।

  • मछलियों को नथ पहनाने की रस्म: यहाँ की सबसे अनोखी बात यह है कि जब किसी भक्त की कोई विशेष मन्नत पूरी होती है, तो वे आभार व्यक्त करने के लिए एक मछली को पकड़ते हैं, उसे धीरे से सोने या चांदी की छोटी सी नथ पहनाते हैं और वापस नदी में सुरक्षित छोड़ देते हैं।

क्यों पहनाई जाती है नथ?

मान्यता है कि मछलियों को आभूषण (नथ) पहनाना देवी को प्रसन्न करने का एक तरीका है।

  • मन्नत और मक्का: लोग अक्सर स्वास्थ्य, संतान प्राप्ति या व्यापार में वृद्धि के लिए मन्नत मांगते हैं। मन्नत पूरी होने पर मछलियों को नथ पहनाने के अलावा उन्हें मक्का (Corn) और चावल के दाने खिलाने की भी परंपरा है।

  • अहिंसा का संदेश: यहाँ मछलियों का शिकार करना या उन्हें खाना सख्त मना है। इन मछलियों को 'देव मत्स्य' माना जाता है, इसलिए स्थानीय लोग और प्रशासन इनकी सुरक्षा का पूरा ध्यान रखते हैं।

पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र

शृंगेरी आने वाले पर्यटक इन 'नथ वाली मछलियों' को देखने के लिए घंटों नदी के किनारे बिताते हैं। साफ पानी में जब ये मछलियाँ तैरती हैं, तो उनके चेहरे पर चमकती नथ एक जादुई दृश्य पैदा करती है।

  • आदि शंकराचार्य से जुड़ाव: कहा जाता है कि इस स्थान की पवित्रता को देखते हुए ही आदि शंकराचार्य ने यहाँ अपने पहले मठ की स्थापना की थी। उन्होंने भी प्रकृति और जीवों के प्रति सम्मान का संदेश दिया था, जो आज भी इस मछली पूजा के रूप में जीवित है।


प्रश्न और उत्तर



2026 के आगामी त्यौहार और व्रत











दिव्य समाचार












ENहिं