नई दिल्ली: सनातन धर्म में सूर्य देव एकमात्र ऐसे देवता हैं जो साक्षात दिखाई देते हैं। उन्हें 'जगत की आत्मा' और 'ग्रहराज' कहा जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक महाविराट अग्निपिंड होने के बाद भी उन्होंने माता अदिति के गर्भ से पुत्र रूप में जन्म क्यों लिया? आइए जानते हैं सूर्य देव के 'आदित्य' बनने की पावन कथा।
पौराणिक काल में देवताओं और दैत्यों के बीच वर्षों तक भयंकर युद्ध चला। दैत्यों की शक्ति के आगे देवता पराजित हो गए और उन्हें स्वर्ग छोड़कर वनों में भटकना पड़ा। जब सृष्टि पर अधर्म बढ़ने लगा, तब देवर्षि नारद इस समस्या को लेकर महर्षि कश्यप के आश्रम पहुँचे।
नारद जी ने महर्षि कश्यप को बताया कि दैत्यों के विनाश के लिए सूर्य के समान तेजस्वी सत्ता की आवश्यकता है। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि सूर्य देव मनुष्य रूप में जन्म लेकर देवताओं का सेनापतित्व करें, तभी विजय संभव है। इस महान कार्य के लिए महर्षि कश्यप की पत्नी और देवमाता अदिति को चुना गया। माता अदिति ने कठोर तप और ध्यान से भगवान सूर्य को प्रसन्न किया। सूर्य देव ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की और 'तथास्तु' कहकर अंतर्ध्यान हो गए।
कुछ समय पश्चात सूर्य देव ने अदिति के गर्भ से जन्म लिया। माता अदिति की संतान होने के कारण उनका नाम 'आदित्य' पड़ा। जन्म के समय से ही बालक आदित्य का तेज इतना दिव्य था कि समस्त ब्रह्मांड आलोकित हो उठा। इंद्र आदि देवताओं ने हर्षित होकर उन्हें अपना सेनापति नियुक्त किया।
आदित्य के प्रचंड तेज और प्रताप के सामने दैत्य अधिक समय तक टिक नहीं सके। उनके भय से दैत्य पाताल लोक में छिप गए और स्वर्ग पर पुनः देवताओं का अधिकार हुआ। इसके बाद, भगवान आदित्य सूर्यदेव के रूप में ब्रह्मांड के केंद्र में स्थित हुए और वहीं से सृष्टि का संचालन करने लगे।