वाराणसी/उज्जैन, 15 फरवरी 2026: आज पूरा देश 'हर-हर महादेव' के जयघोष से गूंज रहा है। फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाने वाली महाशिवरात्रि का पर्व आध्यात्मिक रूप से अत्यंत गहरा महत्व रखता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस रात को 'महा' शिवरात्रि क्यों कहा जाता है? इसके पीछे कई पौराणिक कथाएं और आध्यात्मिक कारण छिपे हैं।
महाशिवरात्रि को मनाने का सबसे प्रमुख कारण भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इसी दिन वैरागी शिव ने अपनी तपस्या त्यागकर गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया था। सती के आत्मदाह के बाद शिव अंतर्मुखी हो गए थे, लेकिन माँ पार्वती की कठोर तपस्या ने उन्हें पुनः संसार से जोड़ा। यह दिन अराजकता और शांति के संतुलन का प्रतीक है।
एक अन्य कथा के अनुसार, महाशिवरात्रि वह दिन है जब भगवान शिव पहली बार 'ज्योतिर्लिंग' के रूप में प्रकट हुए थे। ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता को लेकर हुए विवाद को सुलझाने के लिए महादेव एक अंतहीन अग्नि स्तंभ (ज्योतिर्लिंग) के रूप में प्रकट हुए, जिसका न आदि था और न अंत। यह घटना सिद्ध करती है कि महादेव निराकार और अनंत हैं।
समुद्र मंथन के दौरान जब भयंकर 'हलाहल' विष निकला, जिससे सृष्टि का विनाश निश्चित था, तब महादेव ने संसार की रक्षा के लिए उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया। विष के प्रभाव से उनका गला नीला पड़ गया और वे 'नीलकंठ' कहलाए। देवताओं ने पूरी रात जागकर शिव की स्तुति की, ताकि वे विष के ताप से मुक्त रह सकें। यही कारण है कि भक्त आज भी रात्रि जागरण करते हैं।
आध्यात्मिक दृष्टि से, महाशिवरात्रि की रात को ब्रह्मांड का उत्तरी गोलार्ध इस तरह स्थित होता है कि मनुष्य के भीतर की ऊर्जा प्राकृतिक रूप से ऊपर की ओर बढ़ती है। इसलिए, इस रात को सीधा (रीढ़ की हड्डी सीधी रखकर) बैठकर जागरण करने का विशेष महत्व है। यह 'अज्ञान' के अंधकार को मिटाकर 'ज्ञान' के प्रकाश की ओर बढ़ने की रात है।