काशी में मसान की होली: क्यों जलती चिताओं के बीच खेली जाती है अबीर-गुलाल और चिता भस्म की होली?

वाराणसी (काशी): जहाँ पूरी दुनिया रंगों और खुशियों के साथ होली मनाती है, वहीं मोक्ष की नगरी काशी में होली का एक ऐसा रूप देखने को मिलता है जो जीवन और मृत्यु के शाश्वत सत्य को दर्शाता है। इसे कहते हैं 'मसान की होली'। मणिकर्णिका घाट पर धधकती चिताओं के बीच खेली जाने वाली यह होली केवल उत्सव नहीं, बल्कि महादेव की अघोर साधना और उनके प्रेम का प्रतीक है।

1. पौराणिक कथा: बाबा विश्वनाथ का गौना और मसान के भूत-प्रेत

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, रंगभरनी एकादशी के दिन बाबा विश्वनाथ माता पार्वती का 'गौना' (विदाई) कराकर काशी लौटे थे। उस दिन उन्होंने अपने भक्तों के साथ गुलाल से होली खेली थी।

  • अछूते भक्त: शिव के गणों में भूत-प्रेत, पिशाच और अघोरी भी शामिल हैं। मान्यता है कि वे बाबा के स्वागत उत्सव में शामिल नहीं हो पाए थे।

  • महादेव का प्रेम: अपने इन अनन्य भक्तों को खुश करने के लिए महादेव अगले दिन स्वयं 'महाश्मशान' (मणिकर्णिका घाट) पहुँचते हैं और उनके साथ होली खेलते हैं। चूँकि वहां रंग नहीं होते, इसलिए वहां की 'भस्म' (राख) ही उनका रंग बन जाती है।

2. चिता भस्म से होली: जीवन-मृत्यु का उत्सव

मसान की होली में अबीर-गुलाल के साथ-साथ जलती हुई चिताओं की राख का उपयोग किया जाता है। डमरूओं की गूंज, 'हर-हर महादेव' के उद्घोष और चिताओं से उठते धुएं के बीच साधु-संत और स्थानीय लोग इस उत्सव में डूब जाते हैं।

  • दर्शन: यह होली सिखाती है कि मृत्यु कोई डरावनी चीज़ नहीं, बल्कि जीवन का एक पड़ाव है और महादेव मृत्यु के देवता होकर भी उत्सव के अधिष्ठाता हैं।

3. कब और कहाँ होती है यह होली?

  • तारीख: रंगभरनी एकादशी के ठीक अगले दिन (इस वर्ष 28 फरवरी 2026)।

  • स्थान: मणिकर्णिका घाट (महाश्मशान), वाराणसी।

  • समय: दोपहर के समय जब बाबा मसान नाथ की विशेष आरती और पूजा की जाती है।

4. विश्व भर के पर्यटकों के लिए आकर्षण

आज यह होली केवल अघोरियों तक सीमित नहीं रही। दुनिया भर से फोटोग्राफर और पर्यटक इस अद्भुत और रोंगटे खड़े कर देने वाले दृश्य को देखने काशी पहुँचते हैं। भस्म से सने चेहरे और संगीत की लय पर झूमते भक्त एक ऐसा वातावरण बनाते हैं जो केवल और केवल काशी में ही संभव है।


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