श्री शेषपुरीश्वरर मंदिर: जहाँ नागराज शेषनाग ने की थी महादेव की आराधना और मिटता है सर्प दोष

श्री शेषपुरीश्वरर मंदिर: जहाँ नागराज शेषनाग ने की थी महादेव की आराधना और मिटता है सर्प दोष

महत्वपूर्ण जानकारी

  • दर्शन का समय: सुबह 07:30 बजे से दोपहर 12:30 बजे तक और शाम 04:00 बजे से रात 08:00 बजे तक।
  • निकटतम हवाई अड्डा: तिरुचिरापल्ली अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा (लगभग 120 किमी)।
  • निकटतम रेलवे स्टेशन: पेरालम रेलवे स्टेशन (लगभग 7 किमी) या कुंभकोणम जंक्शन।

तमिलनाडु के तिरुवारूर जिले में स्थित श्री शेषपुरीश्वरर मंदिर (जिसे तिरुप्पामपुरम के नाम से भी जाना जाता है) शैव परंपरा और ज्योतिषीय उपायों के लिए एक अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली केंद्र है। कुंभकोणम से लगभग 30 किमी की दूरी पर स्थित यह मंदिर नवग्रहों में से 'राहु' और 'केतु' के दोषों से मुक्ति के लिए पूरे दक्षिण भारत में सर्वोपरि माना जाता है।

1. पौराणिक कथा: नागराज शेषनाग का प्रायश्चित

'शेषपुरीश्वरर' नाम का अर्थ ही है— "शेषनाग के ईश्वर"। पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भगवान शिव की पूजा करते समय नागराज शेषनाग से अनजाने में एक त्रुटि हो गई, जिससे रुष्ट होकर शिव ने उन्हें अपनी शक्ति खोने का श्राप दे दिया।

अपनी दिव्य शक्तियाँ वापस पाने के लिए शेषनाग पृथ्वी पर आए और उन्होंने महाशिवरात्रि के दिन इस पावन स्थल पर घोर तपस्या की। भगवान शिव उनकी भक्ति से प्रसन्न हुए और उन्हें पुनः अपनी शरण में ले लिया। चूँकि यहाँ नागराज (पाम्‍बू) ने पूजा की थी, इसलिए इस स्थान का नाम 'तिरु-पाम्‍बू-पुरम' पड़ा।

2. मंदिर का चमत्कार: साक्षात् नागराज की उपस्थिति

इस मंदिर से जुड़ा एक ऐसा विस्मयकारी तथ्य है जो वैज्ञानिकों को भी हैरान करता है:

  • साँप का काटना यहाँ बेअसर है: मंदिर के इतिहास और स्थानीय लोगों के अनुसार, इस पूरे गाँव और मंदिर परिसर में आज तक किसी भी व्यक्ति की साँप के काटने से मृत्यु नहीं हुई है। यहाँ के साँपों को विषहीन माना जाता है।

  • चमत्कारी सुगंध: माना जाता है कि जब भी मंदिर परिसर में कोई अदृश्य दिव्य नाग आता है, तो वहाँ चमेली (Jasmine) या केवड़े की तीव्र सुगंध फैल जाती है।

3. राहु-केतु और कालसर्प दोष मुक्ति का महातीर्थ

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, यह मंदिर कालसर्प दोष, राहु-केतु की महादशा और विवाह में आ रही बाधाओं को दूर करने के लिए अचूक माना जाता है:

  • एक ही विग्रह में राहु-केतु: आम तौर पर राहु और केतु अलग-अलग पूजे जाते हैं, लेकिन यहाँ वे दोनों एक ही विग्रह के रूप में भगवान शिव के गर्भगृह के पास स्थापित हैं, जो अत्यंत दुर्लभ है।

  • राहु-केतु का अभिषेक: यहाँ भक्त राहु और केतु को दूध से अभिषेक करते हैं। ऐसी मान्यता है कि यदि कुंडली में गंभीर दोष हो, तो अभिषेक के दौरान दूध का रंग हल्का नीला हो जाता है।

4. मुख्य देवता और वास्तुकला

मंदिर में भगवान शिव 'शेषपुरीश्वरर' (या आत्मानथार) के रूप में और माता पार्वती 'वंडलार पूंगुझली' (प्रसन्नवदनी) के रूप में विराजमान हैं। मंदिर का गोपुरम और इसका पवित्र सरोवर 'आदि शेष तीर्थम' वास्तुकला और शांति का उत्तम उदाहरण हैं।










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