तमिलनाडु के शिवगंगा जिले में काराइकुडी के पास स्थित अरुलमिगु कर्पक विनायक मंदिर (पिल्लईयारपट्टी) भारत के सबसे प्राचीन और प्रतिष्ठित गणेश मंदिरों में से एक है। यह मंदिर एक सुंदर रॉक-कट (चट्टान को काटकर बनाया गया) गुफा मंदिर है, जो लगभग 1,600 साल से भी अधिक पुराना है। विनायक चतुर्थी के दिन इस मंदिर का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है।
आमतौर पर भगवान गणेश की मूर्तियाँ चार भुजाओं (चतुर्भुज) वाली और उनकी सूंड बाईं ओर मुड़ी हुई होती है। लेकिन पिल्लईयारपट्टी के कर्पक विनायक की प्रतिमा अत्यंत दुर्लभ और विशिष्ट है:
दो भुजाएँ: यहाँ गणेश जी केवल दो भुजाओं के साथ विराजमान हैं।
दाहिनी ओर सूंड (वलमपुरी): भगवान गणेश की सूंड दाईं ओर मुड़ी हुई है, जिसे 'वलमपुरी विनायक' कहा जाता है। शास्त्रों में ऐसी प्रतिमा को अत्यंत जाग्रत और तुरंत फल देने वाला माना गया है।
कमल और मोदक: उनके दाहिने हाथ में एक मोदक (लड्डू) है और बायाँ हाथ उनकी कटी (कमर) पर टिका हुआ है। यह लगभग 6 फीट ऊंची भव्य प्रतिमा है जिसे एक गुफा के भीतर सीधे चट्टान से तराशा गया है।
यह मंदिर पल्लव और शुरुआती पांड्य वास्तुकला का एक बेजोड़ नमूना है:
प्राचीन शिलालेख: मंदिर की गुफाओं में मिले शिलालेखों से पता चलता है कि इसका निर्माण 4थी से 5वीं शताब्दी के बीच हुआ था। यह इसे तमिलनाडु के सबसे शुरुआती रॉक-कट गुफा मंदिरों में से एक बनाता है।
वास्तुशिल्प का चमत्कार: मुख्य गर्भगृह एक गुफा के भीतर है, लेकिन इसके बाहर का परिसर चेटिनाड (Chettinad) शैली के राजसी गोपुरम, विशाल स्तंभों और सुंदर नक्काशी से सजा हुआ है।
इस मंदिर में गणेश जी को 'कर्पक विनायक' कहा जाता है। 'कर्पक' शब्द पौराणिक 'कल्पवृक्ष' (Karpaka Vriksha) से आया है— एक ऐसा दिव्य वृक्ष जो आपकी सभी इच्छाओं को पूरा करता है। माना जाता है कि जो भी भक्त यहाँ आकर सच्चे मन से प्रार्थना करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं कल्पवृक्ष की तरह पूरी होती हैं।
पवित्र सरोवर (उरी कुलम): मंदिर के सामने एक विशाल और सुंदर पवित्र सरोवर है, जो इसके वातावरण को और भी शांत और आध्यात्मिक बनाता है।
अन्य देवता: गुफा परिसर के भीतर भगवान शिव (अर्जुनपुरीश्वरर) और माता कात्यायनी की भी प्राचीन मूर्तियाँ स्थापित हैं।
विनायक चतुर्थी (Ganesh Chaturthi): यह यहाँ का सबसे बड़ा त्योहार है, जो 10 दिनों तक बेहद भव्यता के साथ मनाया जाता है। इस दौरान भगवान गणेश को एक विशाल 'विशाल मोदक' (कोझु कट्टई) का भोग लगाया जाता है।