श्री सूतजी ने कहा "हे श्रेष्ठ मुनियों अब एक और कथा कहता हूँ। पूर्वकाल में उल्कामुख नाम का एक बुद्धिमान राजा था। वह सत्यवक्ता और जितेन्द्रिय था। प्रतिदिन देवस्थानों पर जाता तथा गरीबों को धन देकर उनके कष्ट दूर करता था। उसकी पत्नी सुंदर और सती साध्वी थी। भद्रशीला नदी के तट पर उन दोनों ने श्री सत्यनारायण भगवानजी का व्रत किया।
साधु नामक एक वैश्य राजा को व्रत करते देख उनसे पूछने लगा "हे राजन भक्तियुक्त चित्त से यह आप क्या कर रहे हैं? मेरी सुनने की इच्छा है।"
तब महाराज उल्कामुख ने कहा "हे साधु वैश्य मैं अपने बंधु बांधवों के साथ सन्तान की प्राप्ति के लिए महाशक्तिमान सत्यनारायण भगवानजी का व्रत व पूजन कर रहा हूँ।"
उसने कहा "हे राजन मुझे भी इसका सब विधान बताइए। मैं भी आपके कथानुसार इस व्रत को करूँगा। मुझे कोई संतान नहीं है। विश्वास है कि इससे निश्चय ही मेरे यहाँ भी संतान होगी।"
राजा से सब विधान सुन व्यापार से निवृत्त हो वह वैश्य खुशी खुशी अपने घर आया। वैश्य ने अपनी पत्नी लीलावती से संतान देने वाले उस व्रत का समाचार सुनाया और प्रण किया कि जब हमारे यहाँ संतान होगी तब मैं इस व्रत को करूँगा।
एक दिन उसकी पत्नी लीलावती सांसारिक धर्म में प्रवृत्त होकर गर्भवती हो गई। उसने एक सुंदर कन्या को जन्म दिया। कन्या का नाम कलावती रखा गया।
इसके बाद लीलावती ने अपने पति को स्मरण दिलाया कि आपने जो भगवान का व्रत करने का संकल्प किया था अब आप उसे पूरा कीजिए।
साधु वैश्य ने कहा "हे प्रिये मैं कन्या के विवाह पर इस व्रत को करूँगा।"
इस प्रकार अपनी पत्नी को आश्वासन दे वह व्यापार करने चला गया। काफी दिनों पश्चात वह लौटा तो उसने नगर में सखियों के साथ अपनी पुत्री को खेलते देखा। वैश्य ने तत्काल कलावती के लिए कोई सुयोग्य वर की तलाश की। कंचननगर के एक सुयोग्य वणिक पुत्र से अपने बंधु बांधवों सहित प्रसन्नचित्त होकर अपनी पुत्री का विवाह उसके साथ कर दिया।
वैश्य विवाह के समय भी सत्यनारायण भगवान का व्रत करना भूल गया। इस पर श्री सत्यनारायण भगवान की लीला हुई। अपने कार्य में कुशल साधु नामक वैश्य अपने जामाता सहित नाव को लेकर व्यापार करने के लिए समुद्र के समीप स्थित रत्नसारपुर नगर में गया। दोनों ससुर जमाई राजा चंद्रकेतु के नगर में व्यापार करने लगे।
एक दिन भगवान सत्यनारायणजी की माया से प्रेरित एक चोर राजा का धन चुराकर भागा जा रहा था। राजा के दूतों को अपने पीछे आते देखकर चोर ने घबराकर राजा के धन को उनकी नाव में रख कर भाग गया जहाँ ससुर जमाई थे।
जब राजा के धन को उनकी नाव में रखा देखा तो पकड़कर राजा के समीप जाकर बोले "हम ये दो चोर पकड़कर लाए हैं, आप आज्ञा दें।"
राजा ने कारागार में डालने की आज्ञा दे दी। इस प्रकार राजा की आज्ञा से उनको कठिन कारावास में डाल दिया गया तथा उनका धन भी ले लिया गया।
सत्यनारायण भगवानजी की लीला के अनुसार साधु वैश्य की पत्नी लीलावती व पुत्री कलावती भी घर पर बहुत दुःखी हुई। उनके घर में रखा धन चोर ले गए।
एक दिन शारीरिक व मानसिक पीड़ा तथा भूख प्यास से अति दुःखित हो भोजन की चिंता में कलावती एक ब्राह्मण के घर गई। उसने श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत होते देखा। उसने कथा सुनी तथा प्रसाद ग्रहण कर रात को घर आई।
माता ने कलावती से पूछा "हे पुत्री तू अब तक कहाँ रही व तेरे मन में क्या है?"
कलावती बोली "हे माता मैंने श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत होते देखा है।"
तब कलावती के वचन सुनकर लीलावती ने सत्यनारायण भगवानजी के पूजन की तैयारी की। उसने परिवार और बंधुओं सहित श्री सत्यनारायण भगवानजी का पूजन व व्रत किया और वर माँगा कि मेरे पति और दामाद शीघ्र ही घर लौट आएँ। साथ ही प्रार्थना की कि हम सबका अपराध क्षमा करो।
श्री सत्यनारायण भगवानजी इस व्रत से संतुष्ट हो गए। उन्होंने राजा चंद्रकेतु को स्वप्न में दर्शन देकर कहा "हे राजन जिन दोनों वैश्यों को तुमने बंदी बना रखा है वे निर्दोष हैं। उन्हें प्रातः ही छोड़ देना।"
राजा से वचन कहकर भगवान अंतर्ध्यान हो गए।
प्रातःकाल राजा चंद्रकेतु ने सभा में सबको अपना स्वप्न सुनाया और सैनिकों को आज्ञा दी कि दोनों वणिक पुत्रों को कैद से मुक्त कर सभा में लाया जाए।
दोनों ने आते ही राजा को प्रणाम किया।
राजा ने उनसे कहा "हे महानुभावों तुम्हें भावीवश ऐसा कठिन दुःख प्राप्त हुआ है। अब तुम्हें कोई भय नहीं है, तुम मुक्त हो।"
ऐसा कहकर राजा ने उनको नए नए वस्त्राभूषण दिए तथा उनका जितना धन लिया था उससे दूना लौटाकर आदर से विदा किया। दोनों वैश्य अपने घर को चल दिए।
॥ इति श्री स्कन्दपुराणे रेवाखण्डे सत्यनारायण व्रत कथायाम् तृतीयो अध्यायः सम्पूर्णम् ॥ /p>