सावन का पवित्र महीना केवल भगवान शिव की आराधना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह धन, समृद्धि और सौभाग्य की अधिष्ठात्री माता महालक्ष्मी की विशेष कृपा पाने का भी सबसे पावन समय माना जाता है।
सावन पूर्णिमा से ठीक पहले आने वाले शुक्रवार को 'वरलक्ष्मी व्रत' रखा जाता है। इस वर्ष (2026) द्रिक पंचांग के अनुसार यह पावन व्रत 28 अगस्त (शुक्रवार) को मनाया जा रहा है।
आइए जानते हैं कि यह व्रत वास्तव में क्या है, इसे क्यों किया जाता है, इससे किस फल की प्राप्ति होती है और इसके पीछे की अमर कथा क्या है।
'वर' का अर्थ है वरदान (Boon) और 'लक्ष्मी' यानी धन, वैभव और मंगल की देवी। वरलक्ष्मी माता लक्ष्मी का वह करुणामयी स्वरूप हैं जो अपने भक्तों को मुंहमांगा वरदान देने के लिए जानी जाती हैं।
यह व्रत मुख्य रूप से सावन के शुक्ल पक्ष के अंतिम शुक्रवार (पूर्णिमा से पहले) को रखा जाता है।
इसे सुहागिन महिलाएं अपने परिवार की सुख-शांति और पति की दीर्घायु के लिए रखती हैं, लेकिन इसे कोई भी श्रद्धावान भक्त कर सकता है।
सनातन परंपरा में वरलक्ष्मी व्रत करने के तीन मुख्य कारण हैं:
अखंड सौभाग्य और परिवार की सुरक्षा: सुहागिन महिलाएं अपने दांपत्य जीवन में मधुरता, पति के आरोग्य और बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए यह व्रत करती हैं।
दरिद्रता और कर्ज से मुक्ति: घर में चल रही आर्थिक तंगी, बेवजह के खर्च और नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने के लिए माता का आह्वान किया जाता है।
अष्टलक्ष्मी का एक साथ आशीर्वाद: मान्यता है कि अलग-अलग लक्ष्मी रूपों की पूजा करने के बजाय अकेले वरलक्ष्मी व्रत करने से देवी के आठों स्वरूप प्रसन्न हो जाते हैं।
शास्त्रों के अनुसार, सच्चे मन से वरलक्ष्मी व्रत रखने वाले को अष्टलक्ष्मी का वरदान मिलता है:
आदि लक्ष्मी – आत्मबल और आध्यात्मिक शांति
धान्य लक्ष्मी – अन्न और पोषण की प्रचुरता
धैर्य लक्ष्मी – कठिन समय में साहस
गज लक्ष्मी – राजसी सुख, वाहन और प्रतिष्ठा
संतान लक्ष्मी – सुयोग्य और संस्कारी संतान
विजय लक्ष्मी – हर कार्य और बाधा पर विजय
विद्या लक्ष्मी – ज्ञान, बुद्धि और विवेक
धन लक्ष्मी – आर्थिक संपन्नता और वैभव
स्कंद पुराण में भगवान शिव ने माता पार्वती को वरलक्ष्मी व्रत का महत्व बताते हुए यह कथा सुनाई थी:
मगध देश के एक सुंदर नगर में चारुमती नाम की एक अत्यंत संस्कारी और पतिव्रता स्त्री रहती थी। वह अपने सास-ससुर और पति की सेवा पूरे प्रेम और निष्ठा से करती थी तथा स्वभाव से अत्यंत विनम्र थी।
चारुमती के निस्वार्थ भाव से प्रसन्न होकर एक रात माता लक्ष्मी ने उसके स्वप्न में दर्शन दिए। देवी ने कहा:
"हे चारुमती! मैं तुम्हारी भक्ति और सेवाभाव से प्रसन्न हूँ। सावन पूर्णिमा से ठीक पहले आने वाले शुक्रवार को तुम मेरा 'वरलक्ष्मी व्रत' करो। इससे तुम्हारे कुल के सारे संकट दूर होंगे और घर धन-धान्य से भर जाएगा।"
सुबह उठकर चारुमती ने यह बात अपने परिवार और पड़ोस की महिलाओं को बताई। सभी स्त्रियों ने मिलकर सावन के उस शुक्रवार को विधि-विधान से कलश स्थापित किया, माता वरलक्ष्मी का पूजन किया और रक्षा-सूत्र बांधा।
जैसे ही पूजा संपन्न हुई, चमत्कारिक रूप से सभी महिलाओं के घर अन्न, स्वर्ण, वस्त्र और गायों से भर गए। तभी से यह व्रत जन-जन में प्रसिद्ध हो गया।
इस व्रत का सबसे मुख्य आकर्षण कलश स्थापना है:
एक तांबे या पीतल के कलश में अक्षत (चावल), जल, सुपारी, सिक्का और आम के पत्ते रखकर उस पर नारियल स्थापित किया जाता है।
नारियल को माता लक्ष्मी का मुखौटा या चुनरी पहनाकर सजाया जाता है।
पूजा के उपरांत नौ गांठों वाला पीला धागा (डोरक/तोरम) कलाई पर बांधा जाता है, जो माता के रक्षा-कवच का प्रतीक है।
वरलक्ष्मी व्रत केवल धन मांगने का अनुष्ठान नहीं है, यह इस बात की सीख है कि जिस घर में महिलाओं का आदर होता है, जहाँ आपसी सेवा और सत्यनिष्ठा होती है—वहाँ माता लक्ष्मी बिना बुलाए वास करती हैं। इस पावन शुक्रवार को अपने मन के विकारों को दूर कर माता वरलक्ष्मी का ध्यान करें।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्री सिद्ध लक्ष्म्यै नमः! 🚩🌸