हर साल सावन पूर्णिमा पर जब बहनें अपने भाई की कलाई पर रेशम की डोरी बांधती हैं, तो हम इसे सिर्फ भाई-बहन के अटूट रिश्ते का प्रतीक मानते हैं। लेकिन क्या सनातन धर्म के इतिहास में रक्षाबंधन की शुरुआत वाकई भाई-बहन से हुई थी?
जब आप वेदों, पुराणों और इतिहास के पन्नों को पलटेंगे, तो रक्षाबंधन का एक ऐसा रूप सामने आता है जो आज की पीढ़ी ने शायद कभी सुना ही नहीं होगा। आइए जानते हैं रक्षाबंधन से जुड़े 4 सबसे बड़े और अनसुने रहस्य!
पौराणिक इतिहास के अनुसार, रक्षाबंधन की शुरुआत किसी भाई-बहन से नहीं, बल्कि पति-पत्नी के बीच रक्षा के संकल्प से हुई थी।
कथा: देवासुर संग्राम के समय जब दैत्यराज वृत्रासुर ने देवताओं पर भारी प्रहार किया और देवराज इंद्र पराजय की कगार पर पहुँच गए, तब इंद्र की पत्नी शची (इंद्राणी) अत्यंत चिंतित हुईं।
इंद्राणी ने तप और मंत्रों की शक्ति से एक पवित्र रेशमी धागा (रक्षासूत्र) अभिमंत्रित किया और उसे देवराज इंद्र की कलाई पर बांध दिया।
उस रक्षासूत्र की असीम ऊर्जा से इंद्र ने असुरों पर विजय प्राप्त की। उस दिन भी सावन पूर्णिमा ही थी। यानी मूल रूप से रक्षासूत्र किसी भी प्रियजन की सुरक्षा और विजय के लिए बांधा जाने वाला 'सुरक्षा-कवच' है।
महाभारत काल में जब भगवान श्री कृष्ण ने शिशुपाल का वध करने के लिए 'सुदर्शन चक्र' चलाया, तो चक्र वापस आते समय कृष्ण की तर्जनी (उंगली) में गहरा घाव हो गया और खून बहने लगा।
वहाँ उपस्थित रानियां और सेवक पट्टी ढूंढने लगे, लेकिन पास खड़ी द्रौपदी ने एक क्षण भी नहीं सोचा। उन्होंने तुरंत अपनी कीमती रेशमी साड़ी का पल्लू फाड़ा और प्रभु श्री कृष्ण की उंगली पर कसकर बांध दिया।
भगवान श्री कृष्ण द्रौपदी के इस निस्वार्थ प्रेम से भाव-विभोर हो गए और उन्होंने कहा— "बहना! तुम्हारी इस साड़ी के एक-एक सूत का कर्ज मैं तुम्हारे संकट के समय चुकाऊंगा।" बाद में जब भरी सभा में द्रौपदी का चीरहरण हुआ, तब भगवान कृष्ण ने 999 साड़ियों का रूप धरकर उनके सम्मान की रक्षा की थी।
अक्सर रक्षाबंधन पर पंडित जी कहते हैं कि "भद्रा काल चल रहा है, अभी राखी मत बांधो।" लेकिन ऐसा क्यों?
पौराणिक मान्यता है कि लक्ष्मण-मेघनाद युद्ध से ठीक पहले लंकापति रावण की बहन शूर्पणखा ने रावण को 'भद्रा काल' में ही रक्षासूत्र बांध दिया था। भद्रा को शनिदेव की उग्र बहन और विनाशकारी ऊर्जा माना जाता है। इसी अशुभ प्रभाव के कारण एक ही वर्ष के भीतर रावण के पूरे कुल का सर्वनाश हो गया था। इसलिए आज भी भद्रा काल में कभी रक्षासूत्र नहीं बांधा जाता।
सूर्य की पुत्री यमुना अपने भाई यमराज (मृत्यु के देवता) से मिलने के लिए बहुत तड़पती थीं, लेकिन यमराज अपने दायित्वों में इतने व्यस्त रहते थे कि कभी जा नहीं पाते थे।
सावन पूर्णिमा के पावन दिन यमराज अचानक अपनी बहन यमुना के घर पहुँचे। बहन यमुना की खुशी का ठिकाना न रहा। उन्होंने यमराज को छप्पन भोग खिलाए और उनकी कलाई पर रक्षा का धागा बांधा। यमराज इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने यमुना को अमरता का वरदान दिया और कहा— "जो भाई आज के दिन अपनी बहन से रक्षासूत्र बंधवाएगा, उसे कभी अकाल मृत्यु का भय नहीं सताएगा।"
रक्षाबंधन केवल एक धागा बांधने और उपहार लेने-देने की रस्म नहीं है। यह "समर्पण, सुरक्षा और सम्मान" का त्रिवेणी संगम है। धागा रेशम का हो सकता है, लेकिन उसके पीछे का भाव किसी के संकट में ढाल बनकर खड़े होने का होना चाहिए।