क्या आप जानते हैं कि आज से ठीक 2000 साल पहले भी हमारे भारतीय पूर्वज सात समंदर पार जाकर व्यापार और अपनी संस्कृति का डंका बजा रहे थे? हाल ही में दक्षिण-पूर्व एशिया के देश थाईलैंड से एक ऐसी हैरान कर देने वाली खबर आई है, जिसने भारत के प्राचीन गौरव और हमारे पूर्वजों के विदेशी संपर्कों को एक बार फिर दुनिया के सामने ला दिया है।
थाईलैंड के पुरातत्व विभाग (Fine Arts Department) को खुदाई के दौरान 2000 साल पुरानी भारतीय मूल की प्राचीन सोने की अंगूठियां मिली हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से एक अंगूठी पर प्राचीन ‘ब्राह्मी लिपि’ में एक बेहद खास शब्द लिखा हुआ है, जिसका सीधा कनेक्शन हमारे ज्योतिष और नक्षत्र विज्ञान से है!
आइए जानते हैं इस ऐतिहासिक खोज की पूरी और दिलचस्प कहानी।
यह ऐतिहासिक खोज बैंकॉक से लगभग 130 किलोमीटर दूर थाईलैंड के फेत्चाबुरी (Phetchaburi) प्रांत के 'डॉन याई थोंग' (Don Yai Thong) पुरातात्विक स्थल पर हुई है।
कुछ समय पहले यहाँ एक धान के खेत में काम करते समय कुछ प्राचीन कांसे के ड्रम मिले थे, जिसके बाद पुरातत्वविदों ने इस जगह पर वैज्ञानिक खुदाई शुरू की। इसी खुदाई के दौरान लौह युग (Iron Age) के एक प्राचीन मानव कंकाल के पास से सोने की दो अंगूठियां और कुछ कीमती मनके (Beads) बरामद हुए। इतिहासकारों के मुताबिक, ये अंगूठियां करीब 1900 से 2100 साल पुरानी हैं।
खुदाई में मिली दो अंगूठियों में से एक अंगूठी पूरी तरह सादी है, लेकिन दूसरी अंगूठी कला का एक बेजोड़ नमूना है। इस अंगूठी के ऊपरी हिस्से पर प्राचीन भारत की 'ब्राह्मी लिपि' उकेरी गई है।
जब भाषाविदों और लिपि विशेषज्ञों ने इस पर लिखे शब्दों का अध्ययन किया, तो प्राचीन प्राकृत/संस्कृत भाषा का एक शब्द निकलकर सामने आया— “पुसरखितस” (Pusarakhitasa)।
🔮 इसका अर्थ क्या है?
भारतीय ज्योतिष और संस्कृत व्याकरण के अनुसार, "पुसरखितस" का अर्थ होता है— "पुष्य नक्षत्र द्वारा रक्षित" (The one who is protected by Lord Pushya)। हमारे शास्त्रों और ज्योतिष विज्ञान में 'पुष्य नक्षत्र' को सभी 27 नक्षत्रों में सबसे शुभ, कल्याणकारी और धन-समृद्धि देने वाला राजा माना गया है।
थाईलैंड के इतिहासकारों का मानना है कि यह अंगूठी प्राचीन भारत के किसी बेहद समृद्ध और बड़े वैश्य (व्यापारी वर्ग) की रही होगी। आज से 2000 साल पहले, मौर्य और गुप्त काल के दौरान भारतीय व्यापारी समुद्री रास्तों से व्यापार करने के लिए थाईलैंड, कंबोडिया और वियतनाम जैसे देशों की यात्रा करते थे।
उस दौर में इस तरह की अंगूठियों का इस्तेमाल सिर्फ गहने के रूप में नहीं, बल्कि 'सील रिंग' (मुहर वाली अंगूठी) के तौर पर किया जाता था। व्यापारी अपने सामान या दस्तावेजों को सुरक्षित करने के लिए मिट्टी या मोम पर अपनी इस अंगूठी से मुहर लगाते थे। अंगूठी पर 'पुष्य नक्षत्र द्वारा रक्षित' लिखवाना यह दर्शाता है कि वह भारतीय व्यापारी अपनी समुद्री यात्राओं और व्यापार की सुरक्षा के लिए भगवान और नक्षत्रों पर अटूट विश्वास रखता था।
थाईलैंड में मिली यह अंगूठी महज़ सोने का एक टुकड़ा नहीं है, बल्कि यह एक टाइम मशीन है जो हमें 2000 साल पुराने भारत के वैभव और हमारे पूर्वजों के अद्वितीय ज्ञान से रूबरू कराती है। यह खोज साबित करती है कि हमारा सनातन धर्म, हमारी भाषा (ब्राह्मी/संस्कृत) और हमारा खगोल विज्ञान (नक्षत्र) सदियों पहले भी दुनिया के कोने-कोने तक अपनी खुशबू फैला रहा था।