वृंदावन: जब नियति ने करवट ली और कंस का बुलावा अक्रूर जी के माध्यम से गोकुल पहुँचा, तब पूरे ब्रज में शोक की लहर दौड़ गई। लेकिन सबसे अधिक व्यथित थी वह आत्मा, जिसके प्राण कृष्ण में बसते थे—श्री राधा। जब कृष्ण वृंदावन छोड़कर मथुरा के लिए प्रस्थान करने वाले थे, तब उन्होंने अपनी अंतिम विदा के लिए यमुना के उसी घाट को चुना जहाँ उनकी स्मृतियाँ रची-बसी थीं।
यमुना की लहरों में अपने चरण भिगोए राधा जी मौन प्रतीक्षा कर रही थीं। उनका मन अशांत था, हृदय विदीर्ण हो रहा था। कृष्ण आए और राधा के समीप बैठ गए। घंटों तक सन्नाटा पसरा रहा, फिर कृष्ण ने सांत्वना के शब्दों का सहारा लिया। उन्होंने मथुरा जाने के अनगिनत कारण बताए और शीघ्र वापस लौटने के वादे किए। लेकिन क्या कोई वादा विरह के घाव को भर सकता था?
विदा का क्षण निकट था। दोनों के मन में द्वंद्व था—क्या कहें? कैसे कहें? इसी व्याकुलता के बीच राधा जी ने कृष्ण से कई वचन लिए और कृष्ण ने भी राधा से कई वादे किए। लेकिन उस दिन कृष्ण ने राधा से एक ऐसी माँग की, जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी।
कृष्ण ने कहा:
"राधे, मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे एक वचन दो। मेरे मथुरा जाने के बाद तुम्हारी आँखों से एक भी आँसू नहीं गिरना चाहिए। क्योंकि तुम्हारे आँसू मुझे मेरे कर्तव्य पथ से विचलित कर सकते हैं।"
राधा जी स्तब्ध रह गईं। उन्होंने सोचा—"हे कृष्ण! आपने क्या माँग लिया? आप एक बार मेरा जीवन माँग लेते, तो मैं हँसते-हँसते दे देती, पर ये कैसा वचन है?"
किंतु प्रेम तो समर्पण का नाम है। राधा ने वचन दे दिया। कृष्ण चले गए, और पीछे छूट गया एक निशब्द सन्नाटा। विरह की अग्नि में राधा जलती रहीं, मन अशांत रहा, वियोग की तड़प असीमित थी, लेकिन उन्होंने अपनी आँखों को पत्थर बना लिया। दुनिया ने देखा कि राधा रोई नहीं, क्योंकि उन्हें अपने प्रिय के 'कर्तव्य' की चिंता थी। कृष्ण जाते-जाते राधा से उनके रोने का अधिकार भी छीन ले गए थे।
कृष्ण भले ही राधा के आँसू छीन ले गए, लेकिन वे उस प्रेम को नहीं छीन सके जो असीम, अनंत और पराभौतिक था। राधा का वह मौन रुदन और पत्थर बनी आँखें ही उनके प्रेम की पराकाष्ठा बन गईं। स्वयं कृष्ण में भी इतनी सामर्थ्य नहीं थी कि वे राधा के उस प्रेम को कम कर सकें।
।। जय श्री श्याम ।। जय श्री राधे ।।