जब भी हम रामायण की बात करते हैं, तो एक ही प्रश्न उठता है—रावण को किसने मारा? साधारण उत्तर है कि भगवान राम ने रावण का वध किया। लेकिन यदि हम रामायण के उस अंतिम अध्याय में झांकें, जहाँ रावण की मृत्यु के बाद उसकी पत्नी मंदोदरी विलाप कर रही है, तो हमें एक ऐसा 'दार्शनिक सत्य' मिलता है जो आज के युग में भी उतना ही प्रासंगिक है।
जब रावण युद्ध भूमि में अंतिम सांसें ले चुका था, तब मंदोदरी उसके पार्थिव शरीर को देखकर चीख पड़ी। उसकी आंखों में आंसू थे, लेकिन उसकी वाणी में जीवन का सबसे बड़ा ज्ञान था। उसने रावण से पूछा:
"तुमने सीता में ऐसा क्या देखा? ऐसी कौन सी चीज़ है जो मेरे पास नहीं थी और जिसके लिए तुमने सीता को पाने की लालसा की?"
मंदोदरी का यह प्रश्न रावण के उस अहंकार पर प्रहार था जिसने उसे अंधेरे में धकेल दिया था। उसने आगे कहा—"तुम्हारे संस्कार और अंतिम क्रिया करने के लिए विभीषण अभी जीवित है, लेकिन मेरा बेटा तुम्हारी इच्छाओं की वेदी पर चढ़ गया। मेरी अंत्येष्टि कौन करेगा? तुमने मुझे बेसहारा छोड़ दिया।"
लेख का सबसे प्रभावशाली हिस्सा मंदोदरी का वह अंतिम सत्य है, जो आज के समाज के लिए एक चेतावनी है। मंदोदरी ने कहा:
"पूरी दुनिया कह रही है कि राम ने तुम्हें मारा है। लेकिन आज मैं तुम्हारे सामने यह घोषणा करती हूँ कि तुम्हें राम ने नहीं, बल्कि तुम्हारी इंद्रियों की गुलामी ने मारा है।"
यह शब्द आज के 'सेंसरी ओवरलोड' (Sensory Overload) वाले युग में एक आईना हैं। रावण, जो चारों वेदों का ज्ञाता और परम विद्वान था, अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं रख सका। उसकी अनैतिक इच्छाएं और अधर्म ही उसकी मृत्यु का असली कारण बने।
रावण का अंत हमें सिखाता है कि चाहे आप कितने भी शक्तिशाली या विद्वान क्यों न हों, यदि आपकी इच्छाएं मर्यादा और धर्म का उल्लंघन करती हैं, तो आपका पतन निश्चित है। राम ने तो केवल निमित्त बनकर बाण चलाया था, रावण तो उसी दिन मर गया था जिस दिन उसने अपनी इंद्रियों के सामने घुटने टेक दिए थे।