हनुमान जी की 'सुपरसोनिक' रफ्तार: मिराज लड़ाकू विमान से भी तेज़ थी पवनपुत्र की गति; जानें द्रोणागिरी यात्रा का वैज्ञानिक गणित

नई दिल्ली: रामायण में 'लक्ष्मण शक्ति' का प्रसंग एक सुप्रसिद्ध आध्यात्मिक कथा है, लेकिन क्या आपने कभी हनुमान जी द्वारा संजीवनी बूटी लाने की उस यात्रा में लगने वाले समय और उनकी गति का वैज्ञानिक विश्लेषण किया है? यदि हम सुषेण वैद्य के निर्देशों के आधार पर समयरेखा की गणना करें, तो परिणाम आज के आधुनिकतम लड़ाकू विमानों की क्षमताओं को भी पीछे छोड़ देते हैं।

1. समय की कठोर सीमा (Deadlines)

सुषेण वैद्य ने स्पष्ट रूप से कहा था कि हिमालय के द्रोणागिरी पर्वत पर मिलने वाली चार विशेष औषधियां सूर्योदय से पहले, यानी सुबह 5:00 बजे तक हर हाल में लंका पहुँचनी चाहिए। गणना के अनुसार, हनुमान जी लगभग रात 1:30 बजे लंका से हिमालय के लिए रवाना हुए होंगे। उनके पास इस असंभव लगने वाले मिशन को पूरा करने के लिए मात्र 3 घंटे 30 मिनट का समय था।

2. मार्ग के तीन बड़े अवरोध

हनुमान जी की यह उड़ान सीधी नहीं थी। उन्हें मार्ग में तीन बड़ी बाधाओं का सामना करना पड़ा, जिन्होंने उनका कीमती समय सोख लिया:

  • कालनेमि का षड्यंत्र: राक्षस कालनेमि ने उन्हें गुमराह करने की कोशिश की, जिससे लगभग 30 मिनट का समय व्यर्थ हुआ।

  • औषधियों की पहचान: द्रोणागिरी पहुँचने पर सही जड़ी-बूटी की पहचान करने में उन्हें करीब 30 मिनट लगे, जिसके बाद उन्होंने पूरा पहाड़ उठाने का निर्णय लिया।

  • भरत जी का बाण: अयोध्या के ऊपर से गुजरते समय भरत जी ने उन्हें कोई खतरा समझकर बाण से नीचे गिरा दिया। इस दौरान हुए संवाद और पुनः प्रस्थान में और 30 मिनट का समय लगा।

3. अविश्वसनीय गति का विश्लेषण

लंका से हिमालय की दूरी लगभग 2,500 किलोमीटर मानी जाती है, यानी आने-जाने की कुल यात्रा 5,000 किलोमीटर की थी। कुल 3.5 घंटे के समय में से बाधाओं में बीते 1.5 घंटे घटाने के बाद, हनुमान जी के पास वास्तविक उड़ान के लिए मात्र 2 घंटे बचे थे।

  • कुल दूरी: 5,000 किलोमीटर

  • उपलब्ध समय: 2 घंटे

  • गणना की गई गति: 2,500 किलोमीटर प्रति घंटा

4. मिराज लड़ाकू विमान से भी तेज़

आधुनिक युग में, 'मिराज' लड़ाकू विमान की अधिकतम गति लगभग 2,400 किलोमीटर प्रति घंटा है। हनुमान जी की गति संभवतः 2,500 किमी/घंटा से अधिक रही होगी, विशेषकर यह देखते हुए कि वे अपने हाथ में पूरा द्रोणागिरी पर्वत लेकर उड़ रहे थे। यह अद्भुत उपलब्धि उनकी असाधारण योगिक शक्तियों और 'लघिमा' (भारहीनता) व 'गरिमा' (अत्यधिक भार) जैसी सिद्धियों के कारण संभव हुई थी।

निष्कर्ष

यह प्रसंग सिद्ध करता है कि हनुमान जी न केवल संकट के समय रक्षक (संकटमोचन) थे, बल्कि वे सर्वोच्च शक्ति और असीम ऊर्जा के स्रोत भी थे। उनकी यह 'सुपरसोनिक' यात्रा आज के विचारकों के लिए भी कौतूहल का विषय है, जो यह दर्शाती है कि कैसे संकल्प शक्ति भौतिक सीमाओं को पार कर सकती है।


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