विधि का विधान: जब राम और कृष्ण भी नहीं टाल सके प्रारब्ध, तो फिर शुभ मुहूर्त का मोह कैसा?

विधि का विधान: जब राम और कृष्ण भी नहीं टाल सके प्रारब्ध, तो फिर शुभ मुहूर्त का मोह कैसा?

नई दिल्ली: हम अक्सर अपने जीवन की बाधाओं को दूर करने के लिए श्रेष्ठ मुहूर्त, ज्योतिष और उपायों का सहारा लेते हैं। लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि जिस मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का विवाह और राज्याभिषेक स्वयं त्रिकालदर्शी ऋषियों ने शुभ मुहूर्त देखकर तय किया था, उनके जीवन में भी इतनी विषमताएं क्यों आईं? क्यों न उनका वैवाहिक जीवन वैसा रहा जैसा सोचा गया था, और न ही नियत समय पर राज्याभिषेक हो पाया?

मुनि वशिष्ठ का वो सत्य, जो आज भी अटल है

जब श्री राम के जीवन के इन कठिन प्रसंगों पर भरत जी ने मुनि वशिष्ठ से प्रश्न किया, तो मुनिनाथ ने बिलखते हुए जो उत्तर दिया, वह आज भी हर मनुष्य के लिए मार्गदर्शक है:

"सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलखि कहेहूं मुनिनाथ। लाभ हानि, जीवन मरण, यश अपयश विधि हाथ।।"

इसका सीधा अर्थ है—होनी (नियति) अत्यंत प्रबल है। लाभ-हानि, जीवन-मृत्यु और यश-अपयश, ये सब उस 'विधि' यानी ईश्वर के विधान के अधीन हैं जिसे बदला नहीं जा सकता।

महाशक्तियों ने भी स्वीकार किया नियति को

इतिहास और पुराण साक्षी हैं कि बड़ी से बड़ी दैवीय शक्तियों ने भी विधि के विधान में हस्तक्षेप नहीं किया:

  • महादेव और सती: भगवान शिव स्वयं 'महामृत्युंजय' हैं, लेकिन वे भी माता सती की मृत्यु को नहीं टाल सके, क्योंकि वह कालचक्र का हिस्सा था।

  • सिख गुरुओं का बलिदान: गुरु अर्जुन देव जी, गुरु तेग बहादुर साहब जी और दशमेश पिता गुरु गोबिंद सिंह जी—सब समर्थ थे, सर्वशक्तिमान थे, फिर भी उन्होंने धर्म की रक्षा के लिए विधि के विधान को सहर्ष स्वीकार किया।

  • संत और महापुरुष: रामकृष्ण परमहंस जैसे सिद्ध संत भी अपने शरीर के कैंसर को टाल सकते थे, लेकिन उन्होंने प्रकृति के नियम का सम्मान किया।

शक्ति का अहंकार भी नियति के आगे बौना

रावण और कंस जैसे योद्धा, जिनके पास समस्त शक्तियां और सिद्धियां थीं, वे भी अपने अंत को नहीं बदल पाए। मानव अपने जन्म के साथ ही अपनी आयु, यश, लाभ-हानि, स्वास्थ्य और परिवार का नक्शा लेकर आता है।

निष्कर्ष: सहजता ही एकमात्र मार्ग

जब न जन्म लेने का कोई मुहूर्त है और न ही इस संसार से विदा होने का, तो फिर बीच के समय में चिंताओं का अंबार क्यों? इस लेख का सार यही है कि मनुष्य को सरल और सहज रहना चाहिए। मन, कर्म और वचन से केवल सद्कर्म में लीन रहें। जो होना है वह होकर रहेगा, इसलिए अनावश्यक मोह और डर को त्याग कर 'प्रभुमय' रहें।



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