भगवान श्री गणेश को कैसे प्रसन्न करें?

भगवान श्रीगणेश साधारा देवता नहीं हैं। वे साक्षात् अनन्तकोटि-ब्रह्माण्डनायक जगन्नियन्ता परात्पर ब्रह्म ही हैं। श्री गणेशजी तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं के भी परमाराध्य हैं। हम भारतीय सनातन धर्मी हिन्दुओं के तो वे प्राणाधार ही हैं। जन्म से लेकर मरणर्यन्त हमारा उनसे उखण्ड सम्बन्ध बना रहता है। प्रत्येक कार्य करने के प्रारम्भ में श्रीगणेश जी का स्मरण करना अत्यावश्यक कर्तव्य माना गया है। पत्र या बहीखाता या गन्थ लिखते समय सबसे पहले ‘श्रीगणेशाय नमः’ लिखकर तब आगे कुछ और लिखना होता है। किसी भी देवी-देवता की पूजा करते समय अथवा यज्ञ करते समय सबसे पहले यदि श्रीगणेश-पूजन नहीं किया गया तो नाना प्रकार की विघ्र-बाधायें आ जाती हैं? दान-पुण्य करिये तो पहले भगवान् गणेशजी को मनाना न भूलिये। विवाह-शादी करने, मकान बनवाने, नयी दूकान खोलने में सबसे पहले उन्हीं की पूजा होती है। भारत के प्राचीन राजमहल, किले, विशाल देव-मन्दिर, अट्टालिका मिलेगी। दीपावली के दिन तो सभी हिन्दू श्रीगणेश जी और श्रीलक्ष्मी जी का पूजन करते हैं। प्रत्येक धार्मिक-सामाजिक कार्य के पहले श्रीगणेश-पूजन एक अनिवार्य कृत्य है।

भगवान श्रीगणेश कैसे प्रसन्न करें?

भगवान् श्रीगणेश जी को प्रसन्न करने का साधन बड़ा ही सरल और सुगम है। उसे प्रत्येक गरीब-अमीर व्यक्ति कर सकता है। उसमें न विशेष खर्च की, न विशेष दान-पुण्य की, न विशेष योग्यता की और न विशेष समय की ही आवश्यकता है।

पीली मिट्टी की डली ले लो। उसपर लाल कलावा (मोली) लपेट दो। भगवान् श्रीगणेश साकार रूप में उपस्थित हो गये। रोली का छींटा लगा दो और चावल के दाने डाल दो। पूजन की यही सरल विधि है। गुड़ की डली या चार बताशा चढ़ा दो, यह भोग लग गया।

ॐ गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणम् |
उमासुतं शोक विनाशकारकं नमामि विध्नेश्वर पादपंकजं |

यह श्लोक बोल दो, मन्त्र हो गया। बस, इतने मात्र से ही वे तुमसे प्रसन्न हो गये। कैसे दयालु हैं वे? कुछ भी न बने तो दूब ही चढ़ा दो और अपने सारे कार्य सिद्ध कर लो। खर्च कुछ भी नहीं और काम सबसे ज्यादा यही तो उनकी विलक्षण महिमा है।








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