नई दिल्ली: हिंदू धर्म में किसी भी देवी-देवता की आरती के पश्चात एक विशेष मंत्र का उच्चारण अनिवार्य माना जाता है— "कर्पूरगौरं करुणावतारं..."। क्या आपने कभी सोचा है कि भगवान शिव की यह स्तुति इतनी महत्वपूर्ण क्यों है और इसकी रचना किसने की थी? पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस अद्भुत मंत्र का उच्चारण स्वयं भगवान विष्णु ने महादेव की प्रशंसा में किया था।
इस मंत्र का एक-एक शब्द महादेव के अलौकिक स्वरूप की व्याख्या करता है:
कर्पूरगौरं: जो कपूर के समान गौर वर्ण वाले (दूधिया सफेद रंग) हैं।
करुणावतारं: जो साक्षात करुणा के अवतार हैं, जिनके हृदय में दया का सागर है।
संसारसारं: जो इस संपूर्ण सृष्टि का सार (तत्व) हैं।
भुजगेन्द्रहारम्: जो अपने गले में सर्पों का हार धारण करते हैं।
सदा बसन्तं हृदयारबिन्दे: जो भक्त के हृदय रूपी कमल में सदैव निवास करते हैं।
भबं भवानीसहितं नमामि: ऐसे भगवान शिव और माता भवानी (पार्वती) को मैं बारंबार नमन करता हूँ।
महादेव का स्वरूप अक्सर श्मशान निवासी, भस्मधारी और वैरागी के रूप में देखा जाता है, जो देखने में भयंकर प्रतीत हो सकता है। लेकिन माता पार्वती से विवाह के समय, उनके सुंदर और दिव्य स्वरूप को प्रकट करने के लिए भगवान विष्णु ने इस स्तुति का गान किया था। यह मंत्र हमें बताता है कि जो विनाशक हैं, वही सबसे सुंदर और करुणावान भी हैं।
शिव ही 'मृत्युंजय' हैं और वही 'महाकाल' भी। पूरे संसार का जीवन और मरण महादेव के ही अधीन है। आरती के बाद इस मंत्र का उच्चारण करने का अर्थ है कि हम अपनी पूजा को पूर्णता दे रहे हैं और महादेव से प्रार्थना कर रहे हैं कि वे माता भवानी सहित हमारे हृदय में सदा के लिए बस जाएं।