होइहि सोइ जो राम रचि राखा: क्या सब कुछ भगवान पर छोड़ कर बैठ जाना चाहिए? जानिए प्रेमानंद जी महाराज का उत्तर

वृंदावन: अक्सर हम रामचरितमानस की इस चौपाई—"होइहि सोइ जो राम रचि राखा"—का सहारा लेकर अपने कर्तव्यों से मुख मोड़ लेते हैं। हम सोचते हैं कि जब सब कुछ पहले से तय है, तो मेहनत क्यों करें? लेकिन क्या वास्तव में इस चौपाई का यही अर्थ है? वृंदावन के पूज्य संत श्री प्रेमानंद जी महाराज ने इस पर बहुत ही गहरा और स्पष्ट मार्गदर्शन दिया है।

चौपाई का प्रसंग: कब कही गई यह बात?

महाराज जी समझाते हैं कि यह चौपाई उस समय की है जब भगवान शिव ने देखा कि माता सती के मन में श्री राम के स्वरूप को लेकर संशय (संदेह) पैदा हो गया है। भगवान शिव ने उन्हें बहुत समझाया, लेकिन जब सती जी नहीं मानीं और श्री राम की परीक्षा लेने चल पड़ीं, तब महादेव ने कहा:

"होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥
अस कहि लगे जपन हरिनामा। गईं सती जहँ प्रभु सुखधामा॥"

भावार्थ: जो कुछ भगवान श्रीराम ने पहले से निश्चित कर रखा है, वही होगा। व्यर्थ के तर्क-वितर्क करके इस बात को बढ़ाने से क्या लाभ? भविष्य की चिंता में पड़कर चर्चा का विस्तार क्यों करना? ऐसा कहकर महादेव शांत हो गए और हरि नाम का जाप करने लगे, जबकि माता सती अपनी शंका का समाधान करने प्रभु श्री रामचंद्र जी की परीक्षा लेने चली गईं।

प्रेमानंद जी का संदेश: कायर मत बनिए!

महाराज जी कहते हैं कि इस चौपाई का गलत अर्थ निकाल कर "कायर" बनकर बैठ जाना बिल्कुल गलत है। उन्होंने इसके पीछे दो प्रमुख बातें बताई हैं:

  1. पूरा प्रयास करें (Effort First): महाराज जी के अनुसार, हमें सबसे पहले अपना पूरा प्रयास (Effort) कर लेना चाहिए। किसी भी काम को सिद्ध करने के लिए जितनी मेहनत, कौशल और बुद्धि की आवश्यकता है, वह हमें पूरी लगानी चाहिए। हाथ पर हाथ धरकर बैठना भक्ति नहीं, आलस है।

  2. परिणाम पर विश्वास (Trust the Result): जब हम अपना 100% प्रयास कर लें, उसके बाद जो परिणाम (Result) आए, उसे भगवान की इच्छा मानकर सहर्ष स्वीकार कर लेना चाहिए। तब यह चौपाई लागू होती है कि "होइहि सोइ जो राम रचि राखा"। यह चौपाई हमें हार में टूटने से बचाती है।

निष्कर्ष: कर्म और विश्वास का संगम

यदि हम बिना प्रयास किए सब कुछ भाग्य पर छोड़ देते हैं, तो यह तामसी आलस है। लेकिन पूरी ईमानदारी से मेहनत करने के बाद भी यदि फल हमारी इच्छा के अनुसार न मिले, तब इस चौपाई को याद करके मन को शांति देनी चाहिए। भगवान शिव ने भी सती जी को पहले बहुत समझाया (प्रयास किया), और जब वे नहीं मानीं, तब उन्होंने परिणाम श्री राम की इच्छा पर छोड़ दिया।


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