नई दिल्ली: पौराणिक कथाओं में भगवान श्री कृष्ण की लीलाएं केवल मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि जीवन दर्शन को समझाने के लिए होती हैं। ऐसी ही एक कथा श्री कृष्ण और उनकी रानी सत्यभामा के बीच की है, जहाँ नमक (नमक) के एक छोटे से उदाहरण से प्रभु ने गृहस्थ जीवन और स्त्री के त्याग की महानता को सिद्ध किया।
एक बार सत्यभामा ने श्री कृष्ण से पूछा, "प्रभु, मैं आपको कैसी लगती हूँ?" कृष्ण ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, "देवी, तुम मुझे नमक जैसी लगती हो।" यह सुनकर सत्यभामा क्रोधित हो गईं। उन्हें लगा कि क्या पूरे ब्रह्मांड में उनकी तुलना के लिए कोई और कीमती वस्तु नहीं थी? श्री कृष्ण ने उस समय तो उन्हें शांत कर दिया, लेकिन एक पाठ पढ़ाने की योजना बना ली।
कुछ दिनों बाद महल में एक भव्य भोज का आयोजन किया गया। पाक कला में निपुण सत्यभामा ने स्वयं व्यंजनों का निरीक्षण किया था। जैसे ही उन्होंने पहला निवाला मुँह में डाला, उनका चेहरा उतर गया। किसी भी सब्जी में नमक नहीं था। उन्होंने मीठा खाने की कोशिश की, लेकिन नमक के बिना स्वाद का संतुलन ही बिगड़ गया था।
सत्यभामा के क्रोधित होने पर श्री कृष्ण ने सहजता से पूछा, "देवी, यदि भोजन में नमक नहीं है, तो क्या हुआ? अन्य कीमती मेवे और शक्कर तो हैं।" तब सत्यभामा ने झल्लाकर कहा, "बिना नमक के सब कुछ फीका और अर्थहीन है।"
तब श्री कृष्ण ने मंद मुस्कान के साथ कहा— "यही कारण है कि मैंने तुम्हारी तुलना नमक से की थी। जैसे नमक अपना अस्तित्व मिटाकर पूरे भोजन को अर्थपूर्ण और स्वादिष्ट बनाता है, वैसे ही एक स्त्री अपने प्रेम और त्याग से परिवार को जोड़कर रखती है।"