नई दिल्ली: हिंदू धर्म में मृत्यु को अंत नहीं, बल्कि एक नए अध्याय की शुरुआत माना जाता है। गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं कि जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, वैसे ही आत्मा पुराना शरीर छोड़कर नया शरीर धारण करती है। लेकिन इस शरीर त्यागने और नए जन्म के बीच का समय कैसा होता है?
माना जाता है कि जब व्यक्ति का अंतिम समय आता है, तो उसे यमराज के दो दूत (यमदूत) दिखाई देने लगते हैं। जिन्होंने जीवन भर सत्कर्म किए हैं, उनके प्राण आसानी से निकलते हैं, लेकिन जो मोह-माया में फंसे रहे, उन्हें पीड़ा का अनुभव होता है। शरीर छोड़ने के बाद आत्मा 'अंगूठे' के आकार के सूक्ष्म शरीर (प्रेत शरीर) में प्रवेश करती है।
गरुड़ पुराण के अनुसार, मृत्यु के तुरंत बाद यमदूत आत्मा को यमलोक ले जाते हैं, जहाँ उसके कर्मों का लेखा-जोखा (चित्रगुप्त द्वारा) दिखाया जाता है। इसके बाद आत्मा को पुनः उसके घर वापस छोड़ दिया जाता है, जहाँ वह अपने परिजनों के बीच 13 दिनों तक रहती है। यही कारण है कि हिंदू धर्म में 'तेरहवीं' का विशेष महत्व है।
13 दिनों के बाद आत्मा पुनः यमलोक की यात्रा शुरू करती है। इस मार्ग में 16 नगरों को पार करना पड़ता है। बीच में वैतरणी नदी पड़ती है, जो पीप, रक्त और गंदगी से भरी होती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जिस व्यक्ति ने जीवन में 'गौ दान' (गाय का दान) किया होता है, वह आसानी से इस नदी को पार कर लेता है, जबकि पापी व्यक्ति इसमें कष्ट भोगता है।
यमराज के दरबार में पहुँचने पर कर्मों के आधार पर आत्मा को तीन में से एक मार्ग मिलता है:
देवलोक (स्वर्ग): महान पुण्य करने वाले और देवताओं की भक्ति करने वालों को यहाँ स्थान मिलता है।
पितृलोक: जिन्होंने अच्छे कर्म किए परंतु मोक्ष नहीं पाया, वे यहाँ सुख भोगते हैं और पुनः जन्म लेते हैं।
नरक: घोर पाप करने वालों को विभिन्न यातनाओं वाले नरकों में भेजा जाता है।
हिंदू धर्म का अंतिम लक्ष्य 'मोक्ष' है। यदि आत्मा परमात्मा में विलीन हो जाती है, तो उसे पुनः इस नश्वर संसार में नहीं आना पड़ता। इसे ही जीवन का परम सत्य माना गया है।