तमिलनाडु के पुडुकोट्टई जिले में स्थित थिरुपेरुंतुरै, जिसे आज दुनिया आवुदैयार कोइल के नाम से जानती है, केवल एक मंदिर नहीं बल्कि भक्ति और आत्म-साक्षात्कार की एक जीवित गाथा है। अरंथंगी से मात्र 13 किमी की दूरी पर स्थित यह पावन स्थल महान शैव संत माणिक्कवाचकर के जीवन और उनकी दिव्य रचना 'तिरुवाचकम' (Thiruvasagam) से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।
इस स्थान का इतिहास एक अद्भुत चमत्कार से शुरू होता है। राजा वरुणा गुणपांडियन के प्रधानमंत्री रहे माणिक्कवाचकर, घोड़े खरीदने के मिशन पर निकले थे। लेकिन थिरुपेरुंतुरै में एक घने बाग के नीचे उन्हें एक गुरु मिले, जो स्वयं भगवान शिव थे। उस एक मिलन ने प्रधानमंत्री को एक महान संत में बदल दिया। उन्होंने घोड़ों के लिए लाया गया सारा राजकोष इसी मंदिर के निर्माण में लगा दिया, जिससे संसार को 'तिरुवाचकम' जैसा अनमोल स्तोत्र मिला।
आवुदैयार कोइल अपनी वास्तुकला के लिए पूरे भारत में अद्वितीय है:
निराकार महादेव: यहाँ भगवान शिव 'आत्मानथार' के रूप में पूजे जाते हैं। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ कोई लिंगम, नंदी या ध्वजस्तंभ (बलिपीठम) नहीं है। यहाँ महादेव निराकार रूप में विराजमान हैं, जो आत्मा के परमात्मा से मिलन का प्रतीक है।
पत्थर की नक्काशी का चमत्कार: मंदिर की छत और खंभों पर की गई नक्काशी इतनी सूक्ष्म है कि वह पत्थर नहीं, बल्कि लकड़ी या मोम का काम लगती है। यहाँ के 'कोडुंगई' (Curved eaves) और पत्थर की जंजीरें शिल्पकारों के कौशल का प्रमाण हैं।
इस मंदिर की रस्में भी अन्य मंदिरों से भिन्न हैं। यहाँ भगवान को चढ़ाया जाने वाला नैवेद्य (प्रसाद) गर्म उबले हुए चावल और कड़छी से निकाला गया भाप छोड़ता हुआ भोजन होता है, जिसे सीधे गर्भगृह के पत्थर के मंच पर रखा जाता है। माना जाता है कि इसकी सुगंध ही निराकार महादेव का भोग है।
पुडुकोट्टई का यह क्षेत्र शांत और ऊर्जा से भरपूर है। यदि आप वास्तुकला के प्रेमी हैं या उस गहराई को महसूस करना चाहते हैं जिसने 'तिरुवाचकम' जैसी अमर रचना को जन्म दिया, तो आवुदैयार कोइल की यात्रा अनिवार्य है।
देवता और रूप: यहाँ के मुख्य देवता आत्मनाथर (शिव) हैं, जो अरूपी (formless) हैं और केवल एक आधार (पदीथल) के रूप में पूजे जाते हैं। उनकी पत्नी शिवायोगनायकी (योगांबाल) भी अरूपी हैं।
वास्तु और दिशा: यह एक दुर्लभ शैव मंदिर है जो दक्षिण दिशा की ओर मुख करता है। इसमें नंदी बैल की मूर्ति नहीं है, जो आत्मा की निराकारता को दर्शाता है।
छह सभाएं: मंदिर में छह सभाएं (हॉल) हैं: कनकसभा, चित्सभा, सत्सभा, आनंदसभा, रत्नसभा और देवसभा, जो चिदंबरम के पांच सभागों से अधिक हैं।
वास्तुकला: मंदिर में 27 नक्षत्रों की नक्काशी और शिव की मूर्तियों में मानव शरीर रचना (जैसे आंतें) की अत्यंत यथार्थवादी और वैज्ञानिक नक्काशी देखी जा सकती है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: माना जाता है कि मंत्री मणिक्कावासगर ने युद्ध के घोड़ों के लिए दिए गए धन का उपयोग इस मंदिर के निर्माण में किया था, जिससे राजा वरागुन पंड्य II को क्रोध आया था।
मंदिर के दर्शन के दौरान 'तिरुवाचकम' की कुछ पंक्तियों को सुनना या पढ़ना आपके अनुभव को और भी दिव्य बना देगा। यहाँ की पत्थर की नक्काशी को करीब से देखने के लिए हाथ में एक टॉर्च या मोबाइल की लाइट जरूर रखें।