शिव मंदिर में जब भी कोई श्रद्धालु दर्शन या जलाभिषेक के लिए जाता है, तो अक्सर शिवलिंग के सामने खड़े होकर या नंदी जी के पास 3 बार ताली बजाते हुए देखा जाता है।
लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि क्या वेदों, उपनिषदों या शिव महापुराण में ऐसा करने का कोई स्पष्ट लिखित आदेश या प्रमाण मिलता है? या फिर यह सिर्फ एक लोकपरंपरा (Folklore) है?
आइए जानते हैं इस प्रथा की जड़ें कहां हैं, इसके पीछे की पौराणिक कथाएं क्या हैं और शास्त्र असल में क्या कहते हैं।
यदि हम चारों वेदों (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद) और शिव महापुराण का अध्ययन करें, तो शिवलिंग के ठीक सामने खड़े होकर सामान्य पूजा के दौरान 'तीन ताली' बजाने का कोई प्रत्यक्ष अनिवार्य श्लोक नहीं मिलता।
वेदों में रुद्र पूजा के लिए मंत्रोच्चार, नाम-जप, ध्यान और मौन को सर्वोच्च माना गया है। तो फिर यह 3 ताली बजाने की प्रथा आई कहाँ से? इसके पीछे तीन मुख्य पौराणिक और तांत्रिक संदर्भ मिलते हैं:
मान्यता है कि लंकापति रावण भगवान शिव का परम भक्त था। जब उसने कैलाश पर्वत को उठाया और महादेव ने अपने अंगूठे से पर्वत को दबाया, तब पीड़ा और भक्ति में रावण ने शिव तांडव स्तोत्र का गान किया और लयबद्ध होकर तीन तालियों से महादेव की स्तुति की। इसे तीन लोकों (आकाश, पाताल, पृथ्वी) में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का प्रतीक माना गया।
आगम और तंत्र शास्त्रों में भगवान शिव के एक मुख्य गण चण्डेश्वर (Chandeshwar) का उल्लेख आता है।
शिवजी पर चढ़ी हुई सामग्री (निर्माल्य) के अधिकारी चण्डेश्वर माने जाते हैं।
जब भक्त शिव मंदिर से बाहर निकलता है, तो वह दोनों हाथों को झाड़ता है या 3 हल्की ताली बजाता है। इसका अर्थ यह संकेत देना होता है कि: "हे चण्डेश्वर! मैं मंदिर से शिवजी की कोई भी संपत्ति या निर्माल्य अपने साथ अनजाने में भी घर नहीं ले जा रहा हूँ।"
लोकमान्यता में तीन तालियों को तीन अवस्थाओं से जोड़ा गया है:
पहली ताली: अपनी उपस्थिति दर्ज कराना और भगवान से अपने त्रिताप (दैहिक, दैविक, भौतिक कष्ट) दूर करने की प्रार्थना।
दूसरी ताली: बिना किसी कपट के भगवान से भक्ति और सद्बुद्धि मांगना।
तीसरी ताली: शिवधाम या मोक्ष की कामना करना।
शास्त्रों और मंदिर मर्यादा के अनुसार:
महादेव का ध्यान मग्न स्वरूप: भगवान शिव को सदा समाधिस्थ (गहरे ध्यान में लीन) माना जाता है। इसलिए शिवलिंग के बिल्कुल पास जाकर कान के पास या जोर-जोर से ध्वनि करना (ताली बजाना) उनके ध्यान में व्यवधान डालने जैसा माना जाता है।
आरती के समय ताली: आरती, संकीर्तन और भजन के समय ताली बजाना पूर्णतः शास्त्रसम्मत और शुभ है। लेकिन एकांत पूजा या ध्यान के समय शांति और मौन ही सर्वोत्तम है।
शिवलिंग के पास तीन ताली बजाना वेदों का अनिवार्य कर्मकांड नहीं, बल्कि आगम परंपरा, चण्डेश्वर भाव और लोक-भक्ति का एक सुंदर समन्वय है। यदि आप ताली बजाते भी हैं, तो उसे अहंकार या दिखावे के लिए जोर से न बजाएं, बल्कि विनम्रता से अपने दोनों हाथ खाली होने का प्रमाण देते हुए महादेव के चरणों में शीश झुकाएं।
सत्य ही शिव है, और शिव ही सुंदर है! 🚩🔱