अगर आप मध्य जावा (इंडोनेशिया) के हरे-भरे मैदानों में शाम के समय खड़े हों, तो ढलते सूरज की किरणों के बीच एक बेहद लुभावना और हैरान कर देने वाला नज़ारा दिखाई देता है। आसमान को छूती हुई पत्थरों की नुकीली मीनारें ऐसी लगती हैं मानो कोई प्राकृतिक पहाड़ खड़ा हो। लेकिन यह कोई प्राकृतिक चट्टान नहीं है; यह है प्रम्बानन (Prambanan)—प्राचीन इंसानी आस्था, वास्तुकला और इंजीनियरिंग की एक बेमिसाल कलाकृति, जो इंडोनेशिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर परिसर है।
जावा में स्थित इसके प्रसिद्ध बौद्ध पड़ोसी 'बोरोबुदुर मंदिर' की बनावट जहाँ गोल और स्तूप के आकार की है, वहीं प्रम्बानन उसके बिल्कुल विपरीत अपनी ऊंची, नुकीली और खड़ी लाइनों के लिए जाना जाता है। इस मंदिर की बनावट ऐसी है जो देखने वाले की नजरों और उसकी आत्मा को सीधे ब्रह्मांड और ईश्वर की ओर खींचती है।
आइए, यूनेस्को (UNESCO) की इस विश्व धरोहर के गलियारों में कदम रखते हैं और जानते हैं इसका गौरवशाली इतिहास, इसकी दिव्य वास्तुकला और इसके पीछे छिपी लोककथाओं का रहस्य।
प्रम्बानन मंदिर की कहानी आज से लगभग 1100 साल पहले यानी 9वीं शताब्दी (लगभग 850 ईस्वी) में शुरू होती है। इसका निर्माण मध्य जावा के संजय राजवंश (Sanjaya Dynasty) के राजा राकाई पिकातन (Rakai Pikatan) ने करवाया था।
इतिहासकारों का मानना है कि इस भव्य मंदिर को बनाने के पीछे दो मुख्य कारण थे:
सनातन धर्म की वापसी: इस क्षेत्र में कई दशकों तक बौद्ध धर्म के प्रभाव के बाद, शासक राजवंश ने हिंदू धर्म की पुनः स्थापना की खुशी में इस महामंदिर का निर्माण करवाया।
साम्राज्य का गौरव: यह मताराम साम्राज्य (Kingdom of Mataram) का शाही मंदिर था, जिसे हिंदू त्रिमूर्ति—ब्रह्मा, विष्णु और महेश (शिव) को समर्पित किया गया था।
लेकिन इसकी भव्यता के पूरा होने के मात्र 100 साल बाद, इसके आस-पास फलता-फूलता शहर अचानक सूना हो गया। इतिहासकारों का अनुमान है कि पास के ही माउंट मेरापी (Mount Merapi) ज्वालामुखी में हुए एक भयानक विस्फोट और राजनीतिक बदलावों के कारण राजा को अपनी राजधानी पूर्वी जावा की ओर बदलनी पड़ी। इसके बाद यह भव्य मंदिर सदियों तक घने जंगलों, भूकंपों और ज्वालामुखी की राख के नीचे दबा रहा, मानो गहरी नींद में सो गया हो।
प्रम्बानन मंदिर प्राचीन भारतीय 'वास्तु शास्त्र' के सिद्धांतों पर आधारित वास्तुकला का एक अद्भुत चमत्कार है। मूल रूप से इस पूरे परिसर में 240 छोटे-बड़े मंदिर थे, जिन्हें एक बड़े चौकोर मंडल (Mandala Grid) के रूप में डिज़ाइन किया गया था।
इस पवित्र लेआउट के बिल्कुल केंद्र में मुख्य प्रांगण है, जहाँ सबसे विशाल और ऊंची 6 मुख्य मीनारें (संरचनाएं) खड़ी हैं:
मुख्य शिव मंदिर: इस पूरे परिसर के केंद्र में भगवान शिव का मंदिर है, जिसकी ऊंचाई 47 मीटर (154 फीट) है। यह मीनार इतनी ऊंची है कि दूर से ही दिखाई देती है। इसके मुख्य गर्भगृह के अंदर भगवान शिव की 'महादेव' रूप में एक विशाल और दिव्य मूर्ति स्थापित है।
ब्रह्मा और विष्णु मंदिर: मुख्य शिव मंदिर के दोनों तरफ दो थोड़े छोटे लेकिन बेहद सुंदर मंदिर बने हैं—एक सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा के लिए और दूसरा जगत के पालनहार भगवान विष्णु के लिए।
वाहनों के मंदिर: इन तीनों मुख्य मंदिरों के ठीक सामने तीन छोटे मंदिर बने हैं, जो इन देवताओं के पवित्र वाहनों को समर्पित हैं—शिव जी के लिए नंदी (बैल), विष्णु जी के लिए गरुड़ (बाज़), और ब्रह्मा जी के लिए हंस।
जब आप मुख्य प्रांगण की संकरी सीढ़ियों से ऊपर चढ़ते हैं और काले ज्वालामुखी पत्थरों से बनी दीवारों को छूते हैं, तो ऐसा लगता है मानो पत्थर खुद बात कर रहे हों। मंदिर की अंदरूनी दीवारों पर बेहद बारीक और सुंदर नक्काशी (Bas-reliefs) की गई है, जो पूरे रामायण महाकाव्य की कहानी बयां करती है। सीता हरण से लेकर हनुमान जी द्वारा लंका दहन तक की पूरी कहानी दक्षिणावर्त (Clockwise) दिशा में मूर्तियों के जरिए बहुत खूबसूरती से दिखाई गई है, जिसमें जावा की स्थानीय कला की झलक भी मिलती है।
जहाँ इतिहासकार इस मंदिर को राजाओं और शिलालेखों से जोड़ते हैं, वहीं जावा के स्थानीय निवासी इस मंदिर के पीछे एक बहुत ही दिलचस्प और नाटकीय लोककथा सुनाते हैं—रारा जोंगरांग (Rara Jonggrang) की कहानी।
कथा के अनुसार, 'बांडुंग बोंडोवोजो' नाम का एक शक्तिशाली और क्रूर राजकुमार था, जिसे एक बेहद खूबसूरत राजकुमारी 'रारा जोंगरांग' से प्यार हो गया। राजकुमारी उस राजकुमार से नफरत करती थी क्योंकि उसने उसके पिता की हत्या की थी, लेकिन वह सीधे तौर पर शादी से मना करने से डरती थी। इसलिए, उसने राजकुमार के सामने एक असंभव शर्त रखी: "अगर तुम एक ही रात में, सुबह मुर्गे के बांग देने से पहले मेरे लिए 1000 मंदिरों का निर्माण कर दोगे, तो मैं तुमसे शादी कर लूंगी।"
राजकुमार के पास अलौकिक शक्तियां थीं। उसने भूत-प्रेतों और जिन्नों की एक विशाल सेना बुलाई और आधी रात तक ज़मीन से पत्थरों के गगनचुंबी मंदिर खड़े होने लगे। यह देखकर राजकुमारी घबरा गई। उसने चालाकी से काम लिया और अपनी दासियों को बुलाकर पूर्व दिशा में सूखी घास और पुआल में आग लगवा दी और धान कूटने के मूसल चलवा दिए। अचानक हुई तेज़ रोशनी और आवाज़ के कारण स्थानीय मुर्गों को लगा कि सुबह हो गई है और उन्होंने बांग देना शुरू कर दिया।
मुर्गे की आवाज़ सुनते ही सभी भूत-प्रेत काम अधूरा छोड़कर पाताल लोक भाग गए, जिससे राजकुमार के केवल 999 मंदिर ही पूरे हो पाए। जब राजकुमार को राजकुमारी के इस धोखे का पता चला, तो वह गुस्से से आगबबूला हो गया। उसने रारा जोंगरांग को श्राप दे दिया और उसे पत्थर की मूर्ति बना दिया, ताकि वह उस 1000वें मंदिर की सबसे सुंदर मूर्ति बन सके। स्थानीय लोगों का मानना है कि शिव मंदिर के उत्तरी कक्ष में स्थित देवी दुर्गा की मूर्ति वास्तव में वही श्रापित राजकुमारी है।
यह मंदिर इंडोनेशिया के सबसे प्रमुख पर्यटन शहरों में से एक के पास है, जिससे यहाँ आना बेहद आसान है:
स्थान: यह मध्य जावा और योग्याकार्ता (Yogyakarta) की सीमा पर, योग्याकार्ता शहर से लगभग 17 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में स्थित है।
कैसे पहुंचें: आप योग्याकार्ता के मुख्य शहर से 'TransJogja' बस (रूट 1A) ले सकते हैं, जो आपको सीधे मंदिर पार्क के बाहर छोड़ती है। इसके अलावा आप बहुत ही सस्ते दामों पर स्कूटर या प्राइवेट टैक्सी किराए पर ले सकते हैं।
घूमने का सबसे अच्छा समय: यहाँ दोपहर के बाद लगभग 3:30 बजे पहुंचें। इससे आपको दिन के उजाले में पत्थरों पर बनी रामायण की नक्काशी देखने का समय भी मिल जाएगा और आप शाम को ढलते सूरज की सुनहरी रोशनी में इन गगनचुंबी मीनारों का अद्भुत नज़ारा (Sunset View) भी देख पाएंगे।
सबसे खास आकर्षण (Ramayan Ballet): अगर आप शुष्क मौसम (मई से अक्टूबर) के बीच जा रहे हैं, तो रात के समय होने वाले 'रामायण बैले' (Ramayana Ballet) का टिकट ज़रूर बुक करें। यह एक विशाल खुले मंच पर होने वाला लाइव डांस और नाटक का प्रदर्शन है, जिसके बैकग्राउंड में रोशनी से जगमगाता असली प्रम्बानन मंदिर दिखाई देता है।
प्रम्बानन मंदिर के परिसर में घूमना एक अनोखा और शांत करने वाला अनुभव है। यह मंदिर इस बात का जीवंत सबूत है कि कैसे प्राचीन काल में भारतीय संस्कृति और दर्शन दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचे और जावा की स्थानीय संस्कृति के साथ मिलकर एक अद्भुत इतिहास रच दिया। रात के अंधेरे में जब इन हज़ारों साल पुरानी मीनारों पर लाइटें चमकती हैं, तो यह बात साफ़ हो जाती है कि साम्राज्य बनते हैं और मिट्टी में मिल जाते हैं, लेकिन सच्ची आस्था और कला हमेशा अमर रहती है।