जब भी हम भारत और चीन के बीच प्राचीन आध्यात्मिक और सांस्कृतिक संबंधों की बात करते हैं, तो हमारे दिमाग में सबसे पहले बौद्ध भिक्षुओं की शांत तस्वीरें आती हैं। हम ह्वेन सांग (Xuanzang) के बारे में सोचते हैं जो खतरनाक रेगिस्तानों को पार करके नालंदा पहुंचे, या बोधिधर्म की बात करते हैं जिन्होंने शालिन मंदिर में ज़ेन (Zen) और मार्शल आर्ट्स की नींव रखी। सदियों से बौद्ध धर्म को ही इन दो महान सभ्यताओं के बीच का मुख्य पुल माना गया है।
लेकिन अगर आप रेशम मार्ग (Silk Road) के पहाड़ों और रेगिस्तानों को छोड़कर चीन के दक्षिण-पूर्वी समुद्री तटों और व्यस्त बंदरगाहों की तरफ बढ़ेंगे, तो वहाँ की मिट्टी से एक बिल्कुल अलग और अनोखी कहानी निकलकर सामने आती है।
धुंधले पड़ चुके ग्रेनाइट पत्थरों पर उकेरी गई नक्काशी, प्राचीन बौद्ध पैगोडा के स्तंभों और तटीय इलाकों की खुदाई में इतिहास का एक ऐसा पन्ना दबा हुआ है जिसे दुनिया लगभग भूल चुकी है—प्राचीन चीन में सनातन हिंदू धर्म की एक बेहद मजबूत और समृद्ध उपस्थिति।
आइए समय के पहिये को पीछे घुमाते हैं और जानते हैं कि कैसे कभी चीनी तटों की हवाओं में वैदिक मंत्रों की गूंज घुली हुई थी।
चीन में हिंदू धर्म की कहानी ज़मीनी रास्तों से नहीं, बल्कि समुद्री मानसून की लहरों पर सवार होकर पहुंची थी। पुरातात्विक और ऐतिहासिक अध्ययनों से पता चलता है कि कम से कम दूसरी शताब्दी ईस्वी (2nd Century CE) तक चीन में हिंदुओं की एक छोटी लेकिन प्रभावशाली उपस्थिति स्थापित हो चुकी थी।
तांग (Tang) और सोंग (Song) राजवंशों के दौरान, और युआन (मंगोल) राजवंश के समय यह सिलसिला अपने चरम पर पहुंच गया। उस दौर में दक्षिण चीन के बंदरगाह शहर पूरी दुनिया के व्यापारिक केंद्र थे।
भारत के दक्षिण में राज करने वाले शक्तिशाली चोल राजवंश (Chola Dynasty) के समय के तमिल व्यापारिक संघों (Maritime Guilds) के व्यापारी बंगाल की खाड़ी और दक्षिण चीन सागर को पार करके इन चीनी बंदरगाहों पर पहुंचते थे। वे अपने साथ बेहतरीन मसाले, रेशम, कीमती रत्न और इन सबके साथ-साथ अपने आराध्य देवों को भी लेकर आए।
अगर प्राचीन चीन में हिंदू इतिहास की कोई राजधानी थी, तो वह निश्चित रूप से फ़ुज़ियान (Fujian) प्रांत का क्वानझोउ (Quanzhou) शहर था। 13वीं शताब्दी में यह शहर दुनिया के सबसे व्यस्त बंदरगाहों में से एक था।
इस समृद्ध शहर में रहने वाले भारतीय व्यापारियों ने केवल अस्थायी ठिकाने नहीं बनाए, बल्कि उन्होंने पारंपरिक दक्षिण भारतीय वास्तुकला शैली में भगवान शिव को समर्पित एक भव्य और विशाल पत्थर का मंदिर बनवाया था।
समय की मार और राजनीतिक उथल-पुथल के कारण वह मूल शिव मंदिर तो नष्ट हो गया, लेकिन उसके अवशेष आज भी अपनी कहानी चीख-चीख कर बताते हैं। यदि आप आज क्वानझोउ के प्रसिद्ध काइयुआन बौद्ध मंदिर (Kaiyuan Buddhist Temple) में जाएं, तो आपको एक अद्भुत रहस्य देखने को मिलेगा।
जब मिंग राजवंश के दौरान इस बौद्ध मंदिर का पुनर्निर्माण किया जा रहा था, तो चीनी कारीगरों ने नष्ट हो चुके उस प्राचीन हिंदू मंदिर के पत्थरों और नक्काशीदार खंभों का इस्तेमाल इस बौद्ध मंदिर को सहारा देने के लिए किया। परिणामस्वरूप, आज भी इस चीनी बौद्ध मंदिर के अंदर जाने पर आपको अचानक ये चीजें दिखेंगी:
ग्रेनाइट के ऐसे स्तंभ जिन पर भगवान विष्णु के अवतारों की सुंदर नक्काशी है, जैसे 'नरसिंह अवतार' (हिरण्यकश्यप का वध करते हुए) और कालिया नाग का मर्दन करते हुए बाल कृष्ण।
पत्थरों पर उकेरे गए शिवलिंग, जिनकी पूजा पवित्र गाएं और हाथी कर रहे हैं।
ऐसी पौराणिक आकृतियां और मूर्तियां जो पूरी तरह से तंजावुर या मदुरै के मंदिरों जैसी दिखती हैं, लेकिन आज एक चीनी पैगोडा की छत के नीचे चुपचाप खड़ी हैं।
हिंदू संस्कृति और चीन का यह संबंध सिर्फ पत्थरों पर ही नहीं लिखा है, बल्कि यह चीन के सबसे लोकप्रिय साहित्य और लोककथाओं के ताने-बाने में भी बुना हुआ है।

दशकों से इतिहासकार और साहित्यकार एक बेहद दिलचस्प समानता पर चर्चा करते आए हैं: भारत के महाकाव्य रामायण के परम पूजनीय वानर देवता भगवान हनुमान और चीन के सबसे प्रसिद्ध क्लासिक उपन्यास जर्नी टू द वेस्ट के मुख्य किरदार 'सन वुकोंग' (The Monkey King) के बीच की हैरान कर देने वाली समानताएं।
दोनों ही पात्रों के पास असीमित शक्ति है, दोनों बादलों पर उड़ सकते हैं, अपनी मर्जी से शरीर का आकार छोटा या बड़ा कर सकते हैं, और एक पवित्र यात्री की रक्षा के लिए जादुई हथियारों से दुष्टों का संहार करते हैं। कई विद्वानों का मानना है कि चोल काल के भारतीय व्यापारियों और नाविकों द्वारा चीनी बंदरगाहों पर पीढ़ियों से सुनाई जाने वाली रामायण की कहानियों ने ही धीरे-धीरे स्थानीय चीनी लोककथाओं के साथ मिलकर चीन के इस सबसे प्रतिष्ठित सांस्कृतिक नायक 'सन वुकोंग' को जन्म दिया।
चीन में हिंदू धर्म का इतिहास इस बात का एक खूबसूरत प्रमाण है कि प्राचीन काल में संस्कृतियां और सभ्यताएं कभी भी एक-दूसरे से कटी हुई नहीं थीं। वे एक साथ सांस लेती थीं, व्यापार करती थीं और एक-दूसरे की कल्पनाओं व विचारों को अपनाती थीं।
क्वानझोउ के ये पत्थर के नक्काशीदार खंभे आज भी उस समय के गवाह बनकर खड़े हैं जब एक भारतीय व्यापारी हजारों मील दूर अज्ञात समुद्रों को पार कर चीन के तटों पर अपना घर बसा सकता था, जहाँ भगवान शिव की पूजा स्थानीय चीनी देवताओं के साथ पूरी श्रद्धा से की जाती थी। यह इतिहास ग्रेनाइट पर लिखा गया है—सदियों पुराना, थोड़ा धुंधला, लेकिन पूरी तरह से अमर!