चेन्नई/हैदराबाद, 13 जनवरी 2026: दक्षिण भारत के चार दिवसीय फसल उत्सव (Harvest Festival) की शुरुआत आज 'भोगी' के साथ हो गई है। तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाने वाला यह पर्व 'परिवर्तन' का दिन है। आज के दिन लोग पुरानी यादों और वस्तुओं को विदा कर सुख-समृद्धि के नए मौसम का स्वागत करते हैं।
भोगी की सबसे प्रमुख परंपरा सूर्योदय से पहले जलाई जाने वाली पवित्र अग्नि है। तड़के सुबह परिवार अपने घरों के बाहर इकट्ठा होकर लकड़ी और अन्य ठोस ईंधन से आग जलाते हैं।
पुराने का त्याग: लोग पुरानी चटाइयां, फटे पुराने कपड़े और घर के अनुपयोगी सामान को इस अग्नि में डाल देते हैं। इस रस्म को 'भोगी मंतलु' या 'भोगी पाडिगलु' कहा जाता है। यह नकारात्मक विचारों, बुरी आदतों और पिछली असफलताओं के विनाश का प्रतीक है।
साफ-सफाई और सजावट: घरों की पूरी तरह से सफाई और पुताई की जाती है। देवी लक्ष्मी के स्वागत के लिए प्रवेश द्वार पर चावल के आटे और गेंदे के फूलों से बनी भव्य और रंगीन 'कोलम' (रंगोली) बनाई जाती है।
भोगी का दिन वर्षा और बादलों के देवता भगवान इंद्र को समर्पित है। किसान समय पर वर्षा प्रदान करने के लिए इंद्र देव के प्रति आभार व्यक्त करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप फसल भरपूर होती है।
इंद्र पूजा: भविष्य की फसलों और पशुधन के कल्याण के लिए विशेष प्रार्थनाएं की जाती हैं।
भोगी पल्लू: कई घरों में बच्चों से जुड़ी एक अनूठी रस्म निभाई जाती है। बच्चों को 'बुरी नजर' से बचाने और उनके लंबे जीवन को सुनिश्चित करने के लिए उन पर बेर (रेगी पांडलू), गन्ना और सिक्के बरसाए जाते हैं।
बिना पारंपरिक भोजन के कोई भी भारतीय त्योहार अधूरा है। भोगी पर विशेष रूप से:
तमिलनाडु में 'पोली' (दाल और गुड़ से भरी एक मीठी रोटी) अनिवार्य रूप से बनाई जाती है।
आंध्र प्रदेश में परिवार मूँग दाल की खिचड़ी और ताजी कटी हुई फसलों से बने विभिन्न व्यंजनों का आनंद लेते हैं।
इस वर्ष "ग्रीन भोगी" की ओर एक बड़ा बदलाव देखा गया है। वायु प्रदूषण को रोकने के लिए चेन्नई और हैदराबाद की राज्य सरकारों ने अग्नि में प्लास्टिक, रबर या जहरीले पदार्थ न जलाने के लिए परामर्श (Advisory) जारी किया है। नागरिकों को परंपरा की भावना को बनाए रखते हुए हवा को साफ रखने के लिए केवल जैविक कचरे और लकड़ी का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया गया है।