प्रयागराज, 19 जनवरी 2026: माघ मेले में लाखों लोग आते हैं और डुबकी लगाकर चले जाते हैं, लेकिन एक वर्ग ऐसा है जो एक पूरे महीने के लिए इस तपती रेती और कड़ाके की ठंड को अपना घर बना लेता है। इन्हें 'कल्पवासी' कहा जाता है। मौनी अमावस्या के बाद अब कल्पवासियों का मुख्य तप शुरू हो चुका है। संगम की तट पर बसी इस 'टेंट सिटी' (Tent City) के भीतर का जीवन बाहर की चकाचौंध से बिल्कुल अलग है।
कल्पवास का अर्थ है—एक कल्प (समय का एक हिस्सा) के लिए वास करना।
मिट्टी का बिस्तर: यहाँ कल्पवासी गद्दों या पलंग के बजाय जमीन पर पुआल (पराली) बिछाकर उस पर सोते हैं। माना जाता है कि धरती से सीधा जुड़ाव मन को शांत करता है।
अग्नि का प्रबंधन: हर टेंट के बाहर एक 'धूनी' या चूल्हा जलता है। कल्पवासी अपने हाथों से ही शुद्ध सात्विक भोजन (बिना लहसुन-प्याज) बनाते हैं।
कल्पवासियों की दिनचर्या घड़ी की सुइयों से नहीं, बल्कि सूर्य की गति से चलती है:
त्रिकाल स्नान: सुबह के 4 बजे (ब्रह्म मुहूर्त), दोपहर और सूर्यास्त के समय—दिन में तीन बार गंगा की बर्फीली धारा में स्नान करना अनिवार्य है।
एक-भुक्त (One Meal a Day): अधिकांश कल्पवासी पूरे दिन में केवल एक बार ही अन्न ग्रहण करते हैं। बाकी समय वे केवल जल या फलाहार पर रहते हैं।
सत्संग और ध्यान: पूरा दिन भजन, रामायण पाठ और संतों के प्रवचन सुनने में व्यतीत होता है।
2026 के इस दौर में जहाँ लोग बिना मोबाइल के एक घंटा नहीं रह सकते, कल्पवासी स्वेच्छा से मोबाइल और सोशल मीडिया का त्याग कर देते हैं।
मौन व्रत: कई कल्पवासी दिन के कुछ घंटे या पूरा दिन 'मौन' रहने का संकल्प लेते हैं।
सादगी: सफेद या बिना सिला हुआ वस्त्र धारण करना उनकी पहचान होती है, जो सादगी और समानता का संदेश देता है।
पुराणों के अनुसार, कल्पवास के लिए 21 कठिन नियम बताए गए हैं। इनमें चोरी न करना, सत्य बोलना, इंद्रियों पर नियंत्रण, क्रोध का त्याग और अहिंसा सबसे प्रमुख हैं। यदि कोई कल्पवासी इन नियमों को बीच में तोड़ता है, तो उसका व्रत खंडित माना जाता है।
मान्यता है कि एक महीने के इस संयमित जीवन से मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के पाप कट जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। मनोवैज्ञानिक रूप से, यह जीवन को नए नजरिए से देखने और अपनी आंतरिक शक्ति को पहचानने की एक 'स्पिरिचुअल वर्कशॉप' जैसी है।