गायत्री मंत्र

गायत्री मंत्र

गायत्री मंत्र हिन्दुओं का प्रमुख मंत्र माना जाता है। गायत्री मंत्र को सावित्री मंत्र के रूप में भी जाना जाता है। गायत्री मंत्र की कई हिन्दू ग्रंथों में प्रशंसा की है जैसे भगवत गीता, छान्दोग्य उपनिशद, अथर्व वेद आदि। ऐसा माना जाता है कि गायत्री मंत्र को सभी मंत्रों की माता के रूप में भी माना जाता है। इस मंत्र का जाप करने से बुद्धि का विकास होता है। इस मंत्र का जाप करने से सबभी दुःखों व दर्द से छूटकार मिलता है।

सभी चार वेदों में गायत्री मंत्र की तरह कोई और मंत्र नहीं है, वेद, यज्ञ, दान, तप भी गायत्री मंत्र की शक्ति के एक छोटे से हिस्से के बराबर नहीं है। - ऋषि विश्वमित्र

।। ओ३म्।। भूर्भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेणयं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्।।

तात्पर्य :-
तूने हमें उत्पन्न किया, पालन कर रहा है तू।
तुझसे ही पाते प्राण हम, दुखियों के कष्ट हरता तू।।
तेरा महान तेज है, छाया हुआ सभी स्थान।
सूष्टि की वस्तु-वस्तु में, तू हो रहा है विद्यमान।।
तेरा ही धरते ध्यान हम, माँगते तेरी दया।
ईश्वर हमारी बुद्धि को, श्रेष्ठ मार्ग पर चला।।

शब्दार्थ :-
ओ३म् - सबकी रक्षा करने वाला
भूः- जो सब जगत् के जीवन का आधार, प्राण से भी प्रिय और स्वयंभू है।
भुवः - जो सब दुःखों से रहित, जिसके संग से जीव सब दुःखो से छूट जाते है।
स्वः - जो नानाविध जगत् में व्यापक होके सबका धारण करता है।
तत् - उसी परमात्मा के स्वरूप को हम लोग
सवितुः - जो सब जगत् का उत्पादक और सब ऐश्वर्य का दाता है।
वरेण्यम् - जो स्वीकार करने योग्य अतिश्रेष्ठ है।
भर्गः - शुद्ध स्वरूप और पवित्र करने वाला चेतन ब्रह्मस्वरूप है।
देवस्य - जो सभी को वरदान देता है और सभी उसे प्राप्त करना चाहते हैं
धीमहि - धारण करें। किस प्रयोजन के लिये कि
धियः - बुद्धियों को
यः - जो सविता देव परमात्मा
नः - हमारी
प्रचोदयात् - प्रेरणा करें अर्थात् बुरे कामों से छुड़ा कर अच्छे कामों में प्रवृत्त करे।

हे भरणकर्ता एकाकी यात्री सूर्य, हे नियंत्रक, हे सभी प्राणियों के जीवनस्त्रोत! आप अपने प्रकाशपुंज से हमें धन्य करें! - ईशा उपनिषद

हम उस परम शाक्ति का ध्यान करते है जिसने इस संपूर्ण सृष्टि को उत्पन्न किया  है और प्रार्थना करते है की उसमें हमें ज्ञान और सदमार्ग मिले। - स्वामी विवेकानंद

हम उस ईश्वरीय प्रकाश के वैभव का ध्यान करते हुए कामना करते है की वह हमारी बुद्धिमता को प्ररित करे। - स. राधा कृष्णन






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