नई दिल्ली: हिंदू धर्म में पीपल के पेड़ को 'देव वृक्ष' माना गया है। गीता में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है— "अश्वत्थ: सर्ववृक्षाणाम" अर्थात् "मैं वृक्षों में पीपल हूँ।" वैसे तो शास्त्रों में रविवार को पीपल को छूना वर्जित माना गया है, लेकिन शनिवार के दिन पीपल की पूजा और उसे स्पर्श करने का विशेष महत्व है।
मान्यता है कि शनिवार को पीपल को छूने मात्र से दरिद्रता का नाश होता है और कुंडली के गंभीर दोष दूर होते हैं। आइए जानते हैं इसके पीछे की पौराणिक कथा और वैज्ञानिक आधार।
पद्म पुराण के अनुसार, समुद्र मंथन के समय देवी लक्ष्मी से पूर्व उनकी बड़ी बहन 'अलक्ष्मी' (जिन्हें दरिद्रता की देवी माना जाता है) उत्पन्न हुईं। अलक्ष्मी ने वास के लिए ऐसा स्थान मांगा जहाँ कलह और दरिद्रता हो। तब भगवान विष्णु ने उन्हें पीपल के वृक्ष में स्थान दिया।
जब लक्ष्मी जी ने विष्णु जी से विवाह किया, तो उन्होंने अपनी बड़ी बहन के पास जाने की इच्छा जताई। तब विष्णु जी ने कहा कि "प्रत्येक शनिवार को मैं और लक्ष्मी पीपल के वृक्ष में वास करेंगे।" इसीलिए शनिवार के दिन पीपल के वृक्ष में साक्षात लक्ष्मी-नारायण का वास होता है। जो व्यक्ति इस दिन पीपल की पूजा करता है या उसे स्पर्श करता है, उस पर माँ लक्ष्मी की असीम कृपा होती है और उसके जीवन से दरिद्रता (अलक्ष्मी) दूर भाग जाती है।
एक अन्य कथा के अनुसार, ऋषि पिप्पलाद ने पीपल के पत्तों को खाकर तपस्या की थी और शनि देव को परास्त किया था। तब शनि देव ने वचन दिया था कि "जो व्यक्ति शनिवार को पीपल की पूजा करेगा, उसे मेरी कुदृष्टि का सामना नहीं करना पड़ेगा।" इसीलिए शनि की साढ़े साती और ढैय्या के प्रभाव को कम करने के लिए आज के दिन पीपल में जल देना अनिवार्य माना जाता है।
जल अर्पण: सूर्योदय के बाद पीपल की जड़ में जल चढ़ाएं। (वैशाख मास में यह और भी पुण्यदायी है)।
स्पर्श का महत्व: जल चढ़ाने के बाद दोनों हाथों से पीपल के तने को स्पर्श करें और अपनी मनोकामना कहें।
दीपक जलाएं: शाम के समय पीपल के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाएं।
परिक्रमा: कम से कम 7 बार पीपल के वृक्ष की परिक्रमा करें।
पीपल एकमात्र ऐसा वृक्ष है जो 24 घंटे ऑक्सीजन छोड़ता है। शनिवार के दिन जब लोग इसके करीब जाकर इसकी पूजा और स्पर्श करते हैं, तो उन्हें भरपूर ऑक्सीजन मिलती है, जिससे मानसिक तनाव कम होता है और शारीरिक स्फूर्ति बढ़ती है।