

सनातन धर्म में चरण स्पर्श (पैर छूने) की परंपरा सम्मान, श्रद्धा और आशीर्वाद प्राप्ति का प्रतीक है। बड़े-बुजुर्गों, गुरुओं या संतों के चरण स्पर्श करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह परंपरा कुछ नियमों से बंधी हुई है? कुछ रिश्तों या परिस्थितियों में चरण स्पर्श वर्जित है, क्योंकि इससे पाप लग सकता है। धार्मिक ग्रंथों जैसे मनुस्मृति, विष्णु पुराण और लोकाचार्यों के अनुसार, चरण स्पर्श का गलत उपयोग दोनों पक्षों के लिए हानिकारक हो सकता है। इस लेख में हम इन नियमों को विस्तार से समझेंगे, ताकि आप अपनी परंपराओं को सही तरीके से निभा सकें।
सनातन संस्कृति में चरण स्पर्श केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि आत्मिक समर्पण का प्रतीक है। यह गुरु-शिष्य, माता-पिता-संतान या बुजुर्ग-युवा के बीच का बंधन मजबूत करता है। लेकिन जब यह नियमों का उल्लंघन करता है, तो नकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न हो सकती है। आचार्य कहते हैं कि चरण स्पर्श से पहले व्यक्ति की शुद्धि और रिश्ते की प्रकृति का विचार करें। अब आइए, प्रमुख वर्जनाओं पर नजर डालें:
कुंवारी कन्याओं (विवाह पूर्व की लड़कियों) के पैर छूना या उन्हें किसी के पैर छूने देना शास्त्रों में निषिद्ध है। मनुस्मृति में वर्णित है कि कन्या देवी का रूप होती है, और उनका स्पर्श पवित्रता भंग कर सकता है। यदि कोई कुंवारी कन्या आपके पैर छूने का प्रयास करे, तो उसे विनम्रता से रोक दें—अन्यथा आपको पाप लगेगा। उपाय: छोटी बच्चियों या कन्याओं के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लें। यह माता का रूप माना जाता है।
पिता को अपनी बेटियों के पैर कभी नहीं छूने चाहिए। बेटी को घर की लक्ष्मी और देवी का स्वरूप माना जाता है, इसलिए यह स्पर्श पिता को पाप देता है। बेटी भी पिता के चरण स्पर्श न करे। उपाय: बेटी पिता को प्रणाम करे, लेकिन स्पर्श से बचें। यह रिश्ते की पवित्रता बनाए रखता है।
कुछ क्षेत्रीय परंपराओं में बहू सास के पैर छू सकती है, लेकिन श्वसुर के पैर छूना वर्जित है। बहू घर की लक्ष्मी होती है, इसलिए श्वसुर के साथ यह स्पर्श अनुचित माना जाता है। उपाय: बहू को सलाम या प्रणाम से सम्मान दें। सास के साथ स्पर्श परंपरा के अनुसार हो सकता है।
मंदिर में किसी भी व्यक्ति—चाहे वह कितना ही सम्मानित हो—के पैर पहले छूना वर्जित है। पहले भगवान को प्रणाम करें, क्योंकि मंदिर में वे सर्वोच्च हैं। चरण स्पर्श से भगवान का अपमान होता है। उपाय: मंदिर से बाहर निकलकर ही स्पर्श करें। इससे दिव्य ऊर्जा का सम्मान होता है।
यदि कोई पूजा-अर्चना कर रहा है, तो उसके पैर छूना अनुचित है। इससे पूजा में बाधा आती है और दोनों को पाप लगता है। उपाय: पूजा समाप्त होने के बाद स्पर्श करें। पूजा के समय प्रणाम पर्याप्त है।
सोते या लेटे हुए व्यक्ति के पैर छूना शास्त्रों में वर्जित है। ऐसा करने से उसकी आयु घट सकती है। केवल मृत व्यक्ति के पैर ही स्पर्श किए जाते हैं। उपाय: व्यक्ति जागृत होने पर ही स्पर्श करें।
अंतिम संस्कार या श्मशान से लौटने पर व्यक्ति अशुद्ध होता है। उसके पैर छूना वर्जित है। स्नान के बाद ही स्पर्श करें। श्मशान में भी किसी के पैर न छूएं। उपाय: शुद्धि के बाद ही सम्मान दें। इससे पवित्रता बनी रहती है।
यदि आप या सामने वाला व्यक्ति अशुद्ध (मासिक धर्म, मृत्यु संपर्क आदि) है, तो स्पर्श न करें। इससे दोनों को नुकसान हो सकता है। उपाय: शुद्धि के बाद ही परंपरा निभाएं।
भांजे या भांजी को मामा-मामी के पैर न छूने चाहिए। वे पूजनीय होते हैं, इसलिए स्पर्श से मामा-मामी को पाप लगता है। उपाय: प्रणाम या आशीर्वाद से संतुष्ट रहें।
पति-पत्नी का रिश्ता समानता और साझेदारी का है। पति को पत्नी के पैर कभी न छूएं, क्योंकि इससे पत्नी को पाप लगता है। उपाय: एक-दूसरे का सम्मान प्रेम और सहयोग से करें।
चरण स्पर्श सनातन धर्म की अमूल्य धरोहर है, लेकिन इसके नियमों का पालन न करने से इसका महत्व कम हो जाता है। हमेशा शुद्धता, रिश्ते की प्रकृति और स्थान का ध्यान रखें। यदि दुविधा हो, तो स्थानीय पंडित या आचार्य से परामर्श लें। इससे न केवल पाप से बचाव होगा, बल्कि आपकी श्रद्धा और मजबूत बनेगी। सनातन परंपराओं को जीवंत रखें, लेकिन बुद्धि और विवेक से!
नोट: यह लेख धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं पर आधारित है। व्यक्तिगत सलाह के लिए विशेषज्ञ से संपर्क करें।