धर्म और कर्म: केवल मंदिर जाना ही धर्म नहीं, जीवन की हर चेष्टा धर्ममय हो — प्रेमानंद जी महाराज

धर्म और कर्म: केवल मंदिर जाना ही धर्म नहीं, जीवन की हर चेष्टा धर्ममय हो — प्रेमानंद जी महाराज

आज के दौर में 'धर्म' और 'कर्म' को लेकर समाज में बहुत भ्रांतियां हैं। लोग अक्सर पूछते हैं कि कर्म बड़ा है या धर्म? इसी गहरे प्रश्न का समाधान करते हुए प्रेमानंद जी महाराज ने स्पष्ट किया है कि धर्म से रहित कर्म, 'कर्म' नहीं बल्कि 'कुकर्म' है।

1. कर्म और धर्म का वास्तविक संबंध

महाराज जी बताते हैं कि शास्त्रीय दृष्टि से धर्म और कर्म अलग-अलग नहीं हैं। जो क्रिया धर्म के अनुकूल है, उसे ही 'कर्म' (शुभ कर्म) कहा जाता है। यदि कोई कार्य धर्म के विरुद्ध है, तो उसे 'अशुभ कर्म' या 'कुकर्म' की श्रेणी में रखा जाता है। उदाहरण के तौर पर, एक अधिकारी का कर्तव्य निर्दोष को बचाना और दोषी को दंड देना है। यदि वह रिश्वत लेकर दोषी को छोड़ देता है, तो उसका यह कार्य कर्म नहीं, बल्कि कुकर्म बन जाता है।

2. क्या केवल पूजा-पाठ ही धर्म है?

समाज में यह धारणा बन गई है कि मंदिर जाना या आरती करना ही धर्म है। महाराज जी इस पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं कि पूजा-पाठ धर्म का एक छोटा सा अंग मात्र है।

  • धर्म का विस्तार: सोकर उठने से लेकर सोने तक, और जन्म से लेकर मृत्यु तक आपका हर आचरण धर्म युक्त होना चाहिए।

  • चेष्टा में धर्म: आप कैसे बोलते हैं, क्या खाते हैं, और आपका व्यवहार कैसा है—यह सब धर्म के अंतर्गत आता है। यदि आप संभलकर पैर रखते हैं ताकि कोई जीव न मर जाए, या संभलकर बोलते हैं ताकि किसी का हृदय न दुखे, तो आप वास्तव में धर्म का पालन कर रहे हैं।

3. परोपकार ही सबसे बड़ा धर्म: जटायु और राजा शिवि का उदाहरण

महाराज जी ने धर्म को समझाने के लिए दो महान उदाहरण दिए:

  • जटायु का बलिदान: जटायु ने माता सीता की रक्षा के लिए रावण जैसे शक्तिशाली शत्रु से युद्ध किया। उन्होंने अपने प्राणों की बाजी लगा दी, जिसके कारण उन्हें भगवान राम की गोद प्राप्त हुई और वे सीधे वैकुंठ गए। यह उनकी तपस्या नहीं, बल्कि परोपकार का फल था।

  • राजा शिवि की परीक्षा: राजा शिवि ने एक शरणार्थी कबूतर की रक्षा के लिए अपने शरीर का मांस काटकर बाज को दे दिया और अंत में स्वयं तराजू पर बैठ गए। उन्होंने दिखाया कि शरणागत की रक्षा करना ही सच्चा धर्म है।

4. वर्तमान समाज में धर्म का ह्रास और समाधान

महाराज जी ने आज के समाज में बढ़ते अनाचार पर गहरी चिंता व्यक्त की:

  • माता-पिता की सेवा: जिन माता-पिता ने हमें पाल-पोसकर बड़ा किया, उन्हें वृद्धावस्था में अनाथालय छोड़ देना या उनके साथ दुर्व्यवहार करना धर्म के विरुद्ध सबसे बड़ा पाप है। माता-पिता को भगवान के समान मानना ही गृहस्थ धर्म है।

  • चरित्र की रक्षा: आजकल के 'लिव-इन रिलेशनशिप' और अस्थिर संबंधों पर प्रहार करते हुए महाराज जी ने कहा कि यदि चरित्र गया, तो सब कुछ चला गया। बिना पवित्र चरित्र के धर्म को समझना असंभव है।

निष्कर्ष

महाराज जी का संदेश स्पष्ट है: धर्म कोई एक दिन की क्रिया नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका है। यदि हम अपने इंद्रियों पर नियंत्रण रखें, दूसरों के प्रति दया का भाव रखें और अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करें, तो हमारा हर कर्म 'धर्म' बन जाएगा ।


वीडियो का पूरा सार यहाँ देखें: जानिए धर्म क्या है ? कर्म और धर्म में क्या अंतर है ? - Bhajan Marg

इस लेख का उद्देश्य महाराज जी की शिक्षाओं को जन-जन तक पहुँचाना है ताकि समाज में नैतिक मूल्यों का पुनरुत्थान हो सके।



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