विनम्रता ही है उन्नति की डगर

विनम्रता ही है उन्नति की डगर

हमें सब के साथ विनम्रता का बर्ताव रखना चाहिए। द्वेष भावनाओं को त्याग कर सब के साथ मानवता का व्यवहार करना चाहिए। दूसरे की उन्नति में ही हमारी उन्नति है।

बंधुओं, किसी भी देश, राज्य, ग्राम, समाज अथवा घर में उन्नति क्यों नहीं होती है? उसके बारे में हम यहां विवेचन करते हैं। जब किसी स्थान पर आपसी दरार या ईर्ष्या की भावना का किसी भी गलती की वजह से अंकुर पनप जाता है, तो वहां विनाश की स्थिति पैदा हो जाती है। उदाहरण के लिए-
रावण के लघु भ्राता विभीषण एवं बाली के लघु भ्राता सुग्रीव का प्रमाण यह साबित करता है।

रावण ने अपने भाई को तुच्छ जीव समझा तथा बाली ने भी सुग्रीव को अपनी ताकत के आगे ना के बराबर समझा। इसी कारण से दोनों ही विनाश को प्राप्त हुए। जबकि वेद में स्पष्ट किया है कि यज्ञ पुरुष को जब देवताओं ने प्रकट किया तो यज्ञ पुरुष भगवान ने निर्देश किया कि मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय और दोनों जंघाओं से वैश्य तथा दोनों पैरों से शूद्र जाति प्रकट हुई। अर्थात हर मानव के शरीर से ब्रह्म ज्ञान,  भुजाओं से रक्षा, जंघाओं से भरण-पोषण और पैरों से सेवा भाव की उत्पत्ति हुई।

भावार्थ : किसी प्राणी का सिर अलग कर दिया जाए तो समूल प्राणी नष्ट हो जाता है। यदि भुजाएं अलग कर दी जाए तो न अपनी रक्षा कर पाएगा न दूसरों की, और यदि जंघा अलग कर दी जाए तो वह चल नहीं सकता। और यदि पैर अलग कर दिया जाए तो न चल सकता है और न ही खड़ा हो सकता है।

इस तथ्य से हमें यह जानकारी हुई कि प्रकृति ने जो भी हमारे आसपास के वातावरण में भेजा है, चाहे वह पशु हो, चाहे मानव हो या हरियाली के रूप में पेड़-पौधे हो, इन सब का हमारे साथ जन्म जन्मांतर का नाता है।

हमें सब के साथ विनम्रता का बर्ताव रखना चाहिए। सब के साथ समानता का व्यवहार करना चाहिए। दूसरे की उन्नति में ही हमारी उन्नति है।



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