उत्तराखंड के पंच केदारों में द्वितीय केदार के रूप में पूजनीय मदमहेश्वर (Madmaheshwar) धाम अपनी असीम शांति के लिए जाना जाता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि मुख्य मदमहेश्वर मंदिर से ठीक 2 किलोमीटर की खड़ी खड़ी चढ़ाई ऊपर, मखमली बुग्यालों (घास के मैदानों) के शीर्ष पर स्थित है— बुड्ढा मदमहेश्वर मंदिर (या वृद्ध मदमहेश्वर)।
समुद्र तल से लगभग 14,000 फीट की विस्मयकारी ऊंचाई पर स्थित यह पवित्र स्थल अध्यात्म, रोमांच और प्राकृतिक सुंदरता का ऐसा संगम है, जिसे देखकर साक्षात् स्वर्ग की अनुभूति होती है।
मदमहेश्वर से भी प्राचीन: स्थानीय भाषा में 'बुड्ढा' या 'वृद्ध' का अर्थ होता है 'बूढ़ा' या 'प्राचीन'। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह छोटा सा मंदिर मुख्य मदमहेश्वर मंदिर से भी पुराना है। जब महाभारत युद्ध के बाद पांडव गोत्र हत्या के पाप से मुक्ति के लिए महादेव को खोज रहे थे, तब इस क्षेत्र में शिव जी ने इसी पहाड़ी के शीर्ष पर विश्राम किया था।
चट्टानों का विग्रह: मुख्य मंदिर की तरह यहाँ कोई भव्य ढांचा नहीं है, बल्कि यह पत्थरों और प्राकृतिक चट्टानों के झुरमुट से बना एक छोटा सा प्राचीन गर्भगृह है, जहाँ महादेव अदृश्य रूप में विराजमान हैं।
बुड्ढा मदमहेश्वर मंदिर से जुड़ा एक बहुत ही रोचक और आधुनिक तथ्य यह है कि यहाँ आने वाले श्रद्धालु भगवान शिव को किसी पारंपरिक मिठाई या फल के बजाय बिस्कुट और चॉकलेट का प्रसाद चढ़ाते हैं। ऐसा माना जाता है कि अत्यधिक कठिन और दुर्गम पहाड़ों पर मिलने वाली चीज़ों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और पहाड़ी बच्चों/चरवाहों में खुशी बांटने की परंपरा से इसकी शुरुआत हुई थी।
इस मंदिर के शीर्ष की सबसे बड़ी जादूई विशेषता यहाँ मौजूद छोटे-छोटे पानी के कुंड (तालाब) हैं:
हिमालय का प्रतिबिंब: इन कुंडों का पानी इतना शांत और पारदर्शी होता है कि इनमें विशाल चौखंबा (Chaukhamba) और मंदानी पर्वत श्रृंखलाओं का हूबहू मिरर-रिफ्लेक्शन (प्रतिबिंब) दिखाई देता है। ऐसा लगता है मानो पर्वत स्वयं पानी के भीतर तैर रहे हों। फोटोग्राफी के शौकीनों के लिए यह दृश्य किसी वरदान से कम नहीं है।
यहाँ से केदारनाथ, नीलकंठ, त्रिशूल, कामेट और पंचशूली जैसी महान हिमालयी चोटियों का 360-डिग्री नजारा दिखता है।