उत्तराखंड के अलौकिक पर्वतों और नदियों के संगमों के बीच कई ऐसी सिद्धपीठ स्थित हैं, जिनका इतिहास सीधे महाभारत काल और कत्यूरी राजवंश से जुड़ता है। चमोली जिले के कर्णप्रयाग के पास सिमली (Simli) नामक स्थान पर स्थित चंडिका देवी मंदिर (सिमली) एक ऐसा ही जाग्रत और अत्यंत पवित्र धाम है। पिंडर नदी के तट पर स्थित यह मंदिर पूरे क्षेत्र की आस्था, संस्कृति और इतिहास का एक प्रमुख केंद्र है।
महाभारत काल से संबंध: स्थानीय लोक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत युद्ध के बाद जब पांडव स्वर्गारोहण की यात्रा पर हिमालय की ओर जा रहे थे, तब उन्होंने इस स्थान पर विश्राम किया था। यहाँ पांडवों ने भगवती चंडिका को प्रसन्न करने के लिए घोर आराधना की थी और प्रसिद्ध 'पांडव नृत्य' (एक पारंपरिक अनुष्ठानिक नृत्य) किया था।
पिंडर नदी का पावन तट: मंदिर पवित्र पिंडर नदी (कर्णप्रयाग में अलकनंदा से मिलने वाली नदी) के किनारे स्थित है। नदी की कल-कल ध्वनि और पहाड़ों की शांत वादियों के बीच माँ चंडिका का यह गर्भगृह भक्तों को एक अलौकिक शांति और ध्यानमयी ऊर्जा प्रदान करता है।
माँ का जाग्रत रूप: मंदिर के गर्भगृह में माँ चंडिका की एक अत्यंत सुंदर और जाग्रत मूर्ति (विग्रह) स्थापित है। इन्हें साक्षात् शक्ति का रूप माना जाता है, जो अपने भक्तों के सभी कष्टों, भय और नकारात्मक ऊर्जा का नाश करती हैं।
कत्यूरी कालीन वास्तुकला: सिमली का यह मंदिर क्षेत्र उत्तराखंड के ऐतिहासिक कत्यूरी राजाओं के काल की स्थापत्य कला की याद दिलाता है। समय-समय पर स्थानीय समुदायों द्वारा इसका जीर्णोद्धार किया गया है, जिससे इसका मूल आध्यात्मिक स्वरूप आज भी सुरक्षित है।
नवरात्रि उत्सव (चैत्र और शरद): दोनों ही नवरात्रों में यहाँ भक्तों का भारी हुजूम उमड़ता है। इस दौरान नौ दिनों तक विशेष पूजा, चंडी पाठ और अखंड कीर्तन का आयोजन होता है।
पांडव नृत्य और स्थानीय मेले: समय-समय पर यहाँ पारंपरिक पांडव नृत्य का आयोजन किया जाता है, जिसे देखने और आशीर्वाद लेने के लिए दूर-दूर के गाँवों से लोग इकट्ठा होते हैं।