देवभूमि उत्तराखंड की वादियों में जहाँ एक ओर अनछुए हिल स्टेशन हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ ऐसे ऐतिहासिक कोने भी हैं जो कभी महान राजाओं की सत्ता और तंत्र-साधना के मुख्य केंद्र हुआ करते थे। ऐसा ही एक छुपा हुआ रत्न है— देवलगढ़ (Devalgarh)।
खिरसू (Khirsu) से मात्र 15 किमी और श्रीनगर गढ़वाल से लगभग 18 किमी की दूरी पर स्थित देवलगढ़ केवल एक आध्यात्मिक स्थल नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड के गौरवशाली कत्यूरी और पंवार (शाह) राजवंश के सुनहरे इतिहास का साक्षात गवाह है।
राजा देवल द्वारा स्थापना: लोक मान्यताओं के अनुसार, इस नगर की स्थापना वर्ष 1512 में कांगड़ा के राजा देवल ने की थी, जिनके नाम पर इस स्थान का नाम 'देवलगढ़' (देवताओं का किला) पड़ा।
गढ़वाल साम्राज्य की राजधानी: देवलगढ़ का वास्तविक स्वर्णिम काल तब शुरू हुआ जब 16वीं शताब्दी में गढ़वाल के महान राजा अजय पाल ने 52 गढ़ों को एकीकृत करने के बाद अपनी राजधानी को चांदपुर गढ़ी से देवलगढ़ स्थानांतरित किया। उन्होंने ही इस स्थान को अपनी कुलदेवी माँ राजराजेश्वरी की साधना से अभिमंत्रित किया था।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित यहाँ का मंदिर समूह अपनी अनूठी कत्यूरी और नागर शैली की पाषाण वास्तुकला (Stone Architecture) के लिए प्रसिद्ध है:
माँ राजराजेश्वरी देवी मंदिर: यह मंदिर देवलगढ़ का मुकुटमणि है। माँ राजराजेश्वरी गढ़वाल के राजाओं की कुलदेवी थीं। इस चार मंजिला मंदिर की दीवारों और खिड़कियों को केवल पत्थरों को काटकर बनाया गया है, जिसमें लकड़ी का उपयोग बिल्कुल नहीं हुआ है। यहाँ सदियों से एक 'अखंड ज्योति' अनवरत जल रही है। तंत्र साधना के दृष्टिकोण से इसे बेहद जाग्रत पीठ माना जाता है।
गौरी देवी (गौरा देवी) मंदिर: माना जाता है कि इस मंदिर का मूल निर्माण 7वीं शताब्दी के आसपास हुआ था। पौराणिक कथाओं के अनुसार, धन के देवता कुबेर ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था। यहाँ हर साल एक भव्य तीन दिवसीय 'देवलगढ़ मेला' लगता है, जिसमें माँ राजराजेश्वरी और गौरा देवी की उत्सव मूर्तियों को डोली में बाहर निकाला जाता है।
श्री सत्यनाथ भैरव मंदिर: राजा अजय पाल द्वारा निर्मित यह मंदिर नाथ संप्रदाय की सिद्धपीठ है। इसके गर्भगृह में भगवान कालभैरव, आदिनाथ और भुवनेश्वरी देवी की भव्य मूर्तियाँ स्थापित हैं। मंदिर के पीछे एक प्राचीन गुफा भी है, जिसे देवल ऋषि की तपोस्थली माना जाता है।
सोम का मांडा और मुरली मनोहर मंदिर: मंदिर परिसर के पास ही पत्थरों से बना एक मंच है जिसे 'सोम का मांडा' कहा जाता है। इतिहासकार मानते हैं कि राजा इसका उपयोग राजदरबार या न्याय करने के लिए करते थे।
धार्मिक महत्व के अलावा देवलगढ़ अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए भी जाना जाता है। चीड़, बांज और देवदार के घने जंगलों से घिरा होने के कारण यहाँ का वातावरण बेहद शांत और ध्यानमयी है। पहाड़ी की चोटी से हिमालय की बर्फ से ढकी चोटियों का नज़ारा और ढलते सूरज (Sunset) की लालिमा दिल जीत लेती है।
दूरी: यह प्रसिद्ध हिल स्टेशन खिरसू से 15 किमी और श्रीनगर गढ़वाल से 18 किमी दूर है।
निकटतम हवाई अड्डा: जौली ग्रांट एयरपोर्ट, देहरादून (लगभग 140 किमी)।
निकटतम रेलवे स्टेशन: ऋषिकेश (120 किमी) या कोटद्वार (135 किमी)। (ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन पूरी होने के बाद श्रीनगर इसका सबसे पास का स्टेशन होगा)।
सड़क मार्ग: ऋषिकेश या हरिद्वार से बद्रीनाथ राजमार्ग पर चलते हुए श्रीनगर गढ़वाल पहुँचें, जहाँ से खिरसू मार्ग पर देवलगढ़ के लिए स्थानीय टैक्सियाँ आसानी से मिल जाती हैं।
यात्रा का सर्वोत्तम समय: अक्टूबर से मार्च (सुहावने और ठंडे मौसम के लिए) और अप्रैल (वार्षिक मेले के दर्शन के लिए)।