नई दिल्ली, 9 फरवरी 2026: भगवान शिव 'अघोर' भी हैं और 'भोलेनाथ' भी। उनकी पूजा में उपयोग की जाने वाली हर वस्तु—चाहे वह गले में लिपटा सर्प हो या मस्तक पर भस्म—मनुष्य को जीवन का एक बड़ा सत्य सिखाती है। सोमवार के दिन शिव आराधना में भस्म और बिल्वपत्र का महत्व सबसे ऊपर माना गया है।
भगवान शिव अपने पूरे शरीर पर भस्म (विभूति) लगाते हैं।
आध्यात्मिक अर्थ: भस्म हमें याद दिलाती है कि यह शरीर नश्वर है और अंत में राख में ही मिल जाना है। यह मोह-माया के त्याग और वैराग्य का प्रतीक है।
वैज्ञानिक आधार: भस्म शरीर के रोमछिद्रों को बंद करती है, जिससे शरीर पर गर्मी या सर्दी का अधिक प्रभाव नहीं पड़ता। आयुर्वेद के अनुसार, पवित्र भस्म में कीटाणुनाशक गुण होते हैं जो त्वचा की रक्षा करते हैं।
महादेव को बिल्वपत्र चढ़ाए बिना उनकी पूजा अधूरी मानी जाती है। इसके बारे में कहा गया है— "त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रियायुधम्।"
तीन पत्तों का रहस्य: ये तीन पत्ते सत्व, रज और तम गुणों को नियंत्रित करने का प्रतीक हैं। साथ ही, इन्हें ब्रह्मा, विष्णु और महेश (त्रिदेव) का स्वरूप माना जाता है।
शीतलता का गुण: भगवान शिव ने जब विषपान किया था, तब उनके शरीर का ताप बढ़ गया था। बिल्वपत्र की तासीर ठंडी होती है, जो महादेव के मस्तक को शीतलता प्रदान करती है।