उत्तराखंड को यूं ही 'देवभूमि' नहीं कहा जाता; यहाँ का कण-कण शिवमय है और हर कोने का इतिहास पुराणों से जुड़ा है। नैनीताल जिले के प्रसिद्ध हिल स्टेशन भीमताल (Bhimtal) की खूबसूरत झील के तट पर स्थित है— भीमेश्वर महादेव मंदिर। द्वापर युग और महाभारत काल के इतिहास को खुद में समेटे यह प्राचीन मंदिर न केवल गहरा आध्यात्मिक महत्व रखता है, बल्कि इसके कारण ही इस पूरे क्षेत्र का नाम 'भीमताल' पड़ा।
स्कंदपुराण और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा हुआ है:
भीम की एकांत यात्रा: अज्ञातवास के दौरान जब पांचों पांडव हिमालय क्षेत्र में भ्रमण कर रहे थे, तब बलशाली भीम एकांत में इस शांत पर्वतीय क्षेत्र में पहुँचे। भगवान शिव के परम भक्त होने के कारण, भीम ने इस पर्वत पर एक शिवलिंग की स्थापना की और महादेव की घोर तपस्या शुरू कर दी।
गदा के प्रहार से झील की उत्पत्ति: महादेव का जलाभिषेक करने के लिए वहाँ पास में पानी का कोई बड़ा स्रोत नहीं था। तब भीम ने अपनी विशाल गदा से ज़मीन पर एक जोरदार प्रहार किया। गदा की चोट से धरती के भीतर से पानी की एक विशाल धारा फूट पड़ी, जिसने देखते ही देखते एक बड़ी झील का रूप ले लिया। इसी जल से भीम ने महादेव का अभिषेक किया। भीम द्वारा निर्मित होने के कारण इस सरोवर को 'भीमताल' और यहाँ स्थापित शिवलिंग को 'भीमेश्वर महादेव' कहा गया।
यद्यपि शिवलिंग द्वापर युग का है, लेकिन समय के साथ मंदिर का मूल ढांचा प्राकृतिक कारणों से जीर्ण-शीर्ण हो गया था:
राजा बाज बहादुर चंद का योगदान: 17वीं शताब्दी (लगभग 1655 ईस्वी) में कुमाऊं के प्रतापी चंद राजवंश के राजा बाज बहादुर चंद ने इस मंदिर की महत्ता को देखते हुए यहाँ एक भव्य और मजबूत मंदिर का निर्माण करवाया। उन्होंने मंदिर की नींव को इस तरह सुदृढ़ किया कि झील के पानी या किसी भी प्राकृतिक आपदा से मंदिर को नुकसान न पहुँचे।
झील का किनारा: भीमेश्वर महादेव मंदिर भीमताल झील के ठीक तटबंध (Embankment) पर स्थित है। मंदिर परिसर से झील का शांत नीला पानी और चारों ओर घिरे हरे-भरे पहाड़ एक अलौकिक और ध्यानमयी वातावरण का निर्माण करते हैं।
गर्गाचार्य पर्वत (Garg Parvat): मंदिर के ठीक पास ही 'गर्ग पर्वत' स्थित है, जिसे महर्षि गर्गाचार्य की तपस्थली माना जाता है। इसी पर्वत से 'गार्गी नदी' (गोला नदी) का उद्गम भी होता है।
महाशिवरात्रि और सावन का मेला: महाशिवरात्रि और श्रावण मास (सावन) के दौरान यहाँ देश भर से शिवभक्तों का तांता लगता है। इस अवसर पर यहाँ एक विशाल स्थानीय मेले का आयोजन होता है, जहाँ कुमाऊँनी संस्कृति की झलक देखने को मिलती है।