Amarnath Yatra 2026 Today Update: शिव भक्तों के लिए साल का सबसे पावन समय आ गया है। आज यानी 02 जुलाई 2026 से पवित्र श्री अमरनाथ जी की यात्रा आधिकारिक तौर पर शुरू हो गई है। देश के कोने-कोने से आए भोले के भक्तों का पहला जत्था जम्मू के भगवती नगर बेस कैंप से पूरी सुरक्षा के बीच कश्मीर के बालटाल और नुनवान (पहलगाम) बेस कैंप के लिए रवाना हो चुका है।
इस साल बाबा बर्फानी की यह दिव्य यात्रा पूरे 57 दिनों तक चलेगी और इसका समापन रक्षाबंधन (श्रावण पूर्णिमा) के दिन होगा। अगर आप भी इस साल बाबा बर्फानी के दर्शन करने का प्लान बना रहे हैं, तो यह आर्टिकल आपके लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
अमरनाथ गुफा तक पहुँचने के लिए मुख्य रूप से दो रास्ते हैं। श्रद्धालु अपनी सुविधा और सेहत के हिसाब से इनमें से किसी भी एक रूट का चुनाव कर सकते हैं:
पहलगाम रूट (पारंपरिक रास्ता): यह अमरनाथ यात्रा का सबसे पुराना और पारंपरिक रास्ता है। जम्मू से पहलगाम (नुनवान बेस कैंप) पहुँचने के बाद गुफा तक पहुँचने में लगभग 3 से 4 दिन का समय लगता है। यह रास्ता थोड़ा लंबा है, लेकिन इसकी चढ़ाई बालटाल के मुकाबले थोड़ी आसान है।
बालटाल रूट (छोटा रास्ता): अगर आपके पास समय कम है, तो आप बालटाल रूट चुन सकते हैं। गांदरबल जिले में स्थित बालटाल बेस कैंप से पवित्र गुफा की दूरी मात्र 14 किलोमीटर है। इस रूट से श्रद्धालु एक ही दिन में दर्शन करके वापस लौट सकते हैं, लेकिन याद रहे कि यह रास्ता बहुत ही सीधा और खड़ी चढ़ाई वाला है।
प्रशासन ने इस बार सुरक्षा और स्वास्थ्य को लेकर काफी कड़े इंतजाम किए हैं। यात्रा पर निकलने से पहले इन बातों का खास ख्याल रखें:
अनिवार्य हेल्थ सर्टिफिकेट (RFID Tag): बिना वैध कंपल्सरी हेल्थ सर्टिफिकेट (CHC) और बायोमेट्रिक रजिस्ट्रेशन के किसी भी यात्री को बेस कैंप से आगे जाने की अनुमति नहीं दी जा रही है। सुरक्षा के लिए हर यात्री को एक RFID टैग दिया जा रहा है, जिसे गले में पहनना अनिवार्य है।
मौसम का मिजाज: पहाड़ों पर मौसम पल भर में बदल जाता है। इसलिए अपने साथ गर्म कपड़े, रेनकोट, वॉटरप्रूफ जूते और एक छोटी टॉर्च जरूर रखें।
सेहत का ध्यान: अमरनाथ गुफा लगभग 14,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है, जहाँ ऑक्सीजन की कमी हो सकती है। यात्रा के दौरान खुद को हाइड्रेटेड रखें, पानी पीते रहें और चढ़ाई हमेशा धीमी गति से करें।
हिंदू धर्म में अमरनाथ गुफा का स्थान बहुत ऊंचा है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी पवित्र गुफा में भगवान शिव ने माता पार्वती को अमरत्व की कथा (अमर कथा) सुनाई थी, जिसे सुनकर वहां मौजूद दो कबूतर अमर हो गए थे। आज भी कई श्रद्धालुओं को गुफा में कबूतरों का वह जोड़ा दिखाई देता है। यहाँ हर साल प्राकृतिक रूप से बर्फ का शिवलिंग (हिमलिंग) बनता है, जो चंद्रमा की कलाओं के साथ घटता और बढ़ता है।